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Tuesday, December 28, 2010

.!! माँ....!!


















.
.
माँ....!! माँ....!!
दिल की गहराईयों से निकला हुआ एक दिव्य शब्द,
जैसे ही मैं माँ को पुकारती ,
वो गहरी निद्रा से भी उठ कर मुझे अपनी बाहों मैं भर लेती,
और कहती क्या हुआ मेरी रानी बिटिया को,
डर गयी थी क्या!
और तब मैं उसे अपने पुरे  दम से भीच लेती अपने में 

माँ की बाहों का घेरा
मेरे लिए होता एक ठोस सुरक्षा कवच,
फिर डर को भूल उसकी गोद मैं आराम से सो जाया करती,
तब इस बात से होती अनजान की वो भी तो सोएगी....
और माँ अपनी आँखों की नींद चुपके से मेरी पलकों पर
रख कर ममता से भरी नज़रों से निहारा करती

और इसी तरह सुबह का सूरज का हो जाता आगाज
माँ की देहलीज़ पर,
और माँ धीरे से मेरा सर तकिये पर रख कर उठ जाया करती थीं,
हम सभी के लिए,
तब क्यूँ नहीं सोचा कभी माँ के लिए,

आज माँ बन जाने के बाद ,
माँ का हम सब के प्रति समर्पित होना समझ में आता है ,
कितनी ख़ुशी मिलती है अपना सर्वस्व अपने बच्चों पर न्योछावर करके,
खुद को अपने बच्चो में जीना किता देता है ख़ुशी....
भले वो नींद हो, समय हो, या हो  हंसी ,
या फिर ...
निस्वार्थ ममता.!!!!!



Monday, December 27, 2010

माँ ...

माँ....!! माँ....!!




दिल की गहराईयों से निकला हुआ एक दिव्य शब्द,



जैस ही मैं माँ को पुकारती ,



वो गहरी निद्रा से भी उठ कर मुझे अपनी बाहों मैं भर लेती,



और कहती क्या हुआ मेरी रानी बिटिया को,



डर गयी थी क्या!



और तब मैं उसे अपने पुरे दम से भीच लेती अपने में



माँ की बाहों का घेरा



मेरे लिए होता एक ठोस सुरक्षा कवच,



फिर डर को भूल उसकी गोद मैं आराम से सो जाया करती,



तब इस बात से होती अनजान की वो भी तो सोएगी....



और माँ अपनी आँखों की नींद चुपके से मेरी पलकों पर



रख कर ममता से भरी नज़रों से निहारा करती



और इसी तरह सुबह का सूरज का हो जाता आगाज



माँ की देहलीज़ पर,



और माँ धीरे से मेरा सर तकिये पर रख कर उठ जाया करती थीं,



हम सभी के लिए,



तब क्यूँ नहीं सोचा कभी माँ के लिए,



आज माँ बन जाने के बाद ,



माँ का हम सब के प्रति समर्पित होना समझ में आता है ,



कितनी ख़ुशी मिलती है अपना सर्वस्व अपने बच्चों पर न्योछावर करके,



खुद को अपने बच्चो में जीना किता देता है ख़ुशी....



भले वो नींद हो, समय हो, या हो हंसी ,



या फिर ...



निस्वार्थ ममता.!!!!!

Thursday, October 28, 2010

इंतज़ार........


 

दिन बिताये तुम्हारे इंतज़ार मे,

काट ली रातें, मैंने आँखों मे,

ना तुम आये लौट कर कभी ,

ना कभी खवाब आये रातों मे,

दिन भर मुस्कुराई तुम्हारा ख़याल करके,

और तुम्हे याद कर अश्क बहाए रातों मे,

तुम मिलते, तो गिला करती तुमसे,

खुद से शिकवे किये मैंने रातों मे,

तुमसे मिलना हुआ बस ख्यालों मे,

और यूँही मिलती रही जज्बातों से ,

आस अधूरी ही रही मिलन,

सावन की बरसातों मे,

वो कैसे जानता मेरे दिल की बात ,

जब कोई बात हुए ही नहीं अल्फाज़ो मे,

चाँद रोज निकलता है चाँदनी लेकर

और मैं सुलग रही हूँ रातों मे,

धरती मिलती है क्या कभी गगन से,

या फिर यूँही सफ़र किये जा रही हूँ कई सालों से ....



Wednesday, September 29, 2010

क्यूँ ......


































क्यूँ ......
आज कल कुछ सूझता नहीं मुझे,
क्या कहूँ मैं तुमसे?
तुम ही कुछ कहो ना...
जब से तुमने मुझे अपना मान लिया है ,
ना जाने तब से शब्द कहाँ खो गए हैं,
बस अब धड़कने और मेरी साँसे बोलती हैं ,
ना जाने ,क्यूँ तुम उन्हें नहीं सुनते,
क्यूँ अपनी धडकनों से मेरी धडकनों की बात नहीं करते,
कल रात भी जब मैं तुम्हारे सीने पर सर रख कर बहुत कुछ कह रही थी ,

ख़ामोश से मेरे लब ,
शब्दों का बोझ उठा नहीं पा रहे थे,
तब मेरी धड़कने सब कह रहीं थीं,
तब भी तुमने कुछ नहीं सुना था,
है ना!!!!!
बस एक टक निहारते रहते हो मुझे ,
चूमते रहते हो मेरी बंद पलकों को,
और उस वक़्त...
मैं मर कर भी जी उठती हूँ ,
तुम्हारी बाहों में,
वादा करो.......
तुम मुझे यूँही जिंदा रखोगे ,
अपने ख्यालों में,
जैसे मैंने आज तक तुम्हे जिंदा रखा है अपनी रूह में ,
पल पल मरने के बाद भी ,
जी रही हूँ सिर्फ तुम्हारे लिए.

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क्यूँ ......

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Thursday, September 16, 2010

इतंजार















इंतज़ार......


और बस इंतज़ार...

कब ख़त्म होगा ये इंतज़ार,

क्या तब ...

जब मैं बिखर जायुंगी,

या तब....

जब मैं सिमट नहीं पायुंगी,

क्यूँ ख़त्म नहीं होता अमावस की रात सा इंतज़ार,

सूनी राह पर पडे मील के पत्थर का इंतज़ार,

उफ्फ ये इंतज़ार,

क्यूँ कर रही हूँ ,और किसका कर रही हूँ मैं इंतज़ार,

क्या उसका, जो कभी ना लौट आने के लिए चला गया ,

या फिर उसका ..

जो बस उम्मीद दे गया लौट आने की,

जानती हूँ व्यर्थ है अब इंतज़ार...

फिर भी पलकें बिछाए कर रही हूँ इंतज़ार..

जबकि जानती हूँ ,

अब बस उतना ही समय रह गया है मेरे पास ,

जितना हाथ से फिसलती हुई रेत के पास होता है,

मुट्ठी मे रहने का ,

अब कहो...

क्या इतनी जल्दी आ पायोगे

क्या मुझे अपनी हथेलियों मे समेटे रख सकोगे,

नहीं ना....

क्युंकी तुमने मुझे रेत से बढ़ कर कभी अपनी हथेलियों मैं समेटा ही नहीं,

क्युंकी मैं सच मे रेत हूँ ,

और तुम समय,

तुम मेरे लिए कब रुके हो?

कभी नहीं....

लेकिन...

मैं आज भी रुकी हुई हूँ,

सूनी राहों मे तुम्हारी यादों को हमसफ़र बना कर ,

मैं आज भी कर रही हूँ,

तुम्हारा इंतज़ार............


Monday, August 16, 2010

मेरे खबाब


कुछ मेरी अनकही,
कुछ अपनी कही हुए वो सब बातें,
सब उकेर दो कागजों पर,
कुछ सपने लिखना ,
कुछ लम्हे लिखना,
जिन्हें अक्सर जीती हूँ मैं तुम्हारे लिए ,
कुछ रातें,
कुछ बीते हुए, अहसास भी लिख देना,
जीना चाहती हूँ मैं फिर से वही अहसास,
फिर से सजा लुंगी अपनी आँखों में,
भर लुंगी उन्हें मोतियों की तरह,
लेकिन तुम्हे आज एक वादा करना होगा,
इन मोतियों को गिरने नहीं दोगे कभी,
किसी और के कंधे पर,
खा लो कसम...
समेट लोगे मुझे,
मेरे खवाबों को सजा लोगे अपनी पलकों पर
मेरे लिए तोड़  लाओगे वो चाँद,
जो रोज़ मुझे और मेरी मोहब्बत को निहारा करता है,
अक्सर तुम्हारी खिड़की से,
इस बार छिपा दूंगी में उसे किसी कोने में,
नहीं चाहिए तुम्हारे होते हुए मुझे चाँद और चांदनी.
और फिर बस में और तुम, और हमारी रात,
तुम और तुम्हारी बात.
बस तुम और तुम्हारी, मेरी बात.

Thursday, July 22, 2010

साया


यहीं तो हूँ मैं,

कहाँ जा सकती हूँ अब,

कहीं भी तो नहीं,

बस खुद को खुद में,

तो कभी तुम में खुद को तलाशती रहती हूँ ,

जो साया तुम्हारे पीछे है,

कहीं वो मेरा तो नहीं,

या शायद जो साया मेरे साथ है,

वो तुम्हारा तो नहीं,

बस यूँही भटकती रहती हूँ मैं अक्सर अंधेरों में ,

लेकिन देखो ना ,

फिर भी गुम नहीं हो पाती हूँ मैं,

क्यूंकि तुम मुझे ढूंढ ही लाते हो,

कभी ख्यालों में,

कभी खवाबों में,

तुम कब हाथ थाम लेते हो

पता ही नहीं चलता,

इसीलिए खुद को तन्हा भी तो नहीं कह सकती हूँ में,

तुम्हारा अहसास भर रोज़ मुझे चंद साँसे दे जाता है,

तुम्हे जीने के लिए ,

तुम में ,

खुद को फिर से ढूंढ लाने के लिए,

तुम्हारे नज़दीक आने के लिए,

जब तुम छू लेते हो ,मेरे नर्म गर्म होंठों को ,

तब मैं मर कर भी जी उठती हूँ ,

तुम्हारी आगोश में,

क्यूँ तुम मुझे यूँही नहीं पड़े रहने देना चाहते ,



अपनी आगोश में ,

बस आज मुझे मर जाने दो अपनी बाहों में ,

बस एक बार,

बस इस बार,

बस आखिरी बार....

 

Monday, July 12, 2010

यहीं तो हूँ मैं,......

यहीं तो हूँ मैं,
कहाँ जा सकती हूँ अब
कहीं भी तो नहीं,
बस खुद को खुद में, तो कभी तुम में खुद को तलाशती रहती हूँ ,
जो साया तुम्हारे पीछे है, कहीं वो मेरा तो नहीं,
या शायद जो साया मेरे साथ है, वो तुम्हारा तो नहीं,
बस यूँही भटकती रहती हूँ मैं अक्सर अंधेरों में ,
लेकिन देखो ना ,फिर भी गुम नहीं हो पाती मैं,
क्यूंकि तुम मुझे ढूंढ ही लाते हो,
कभी ख्यालों में, कभी खवाबों में,
तुम कब हाथ थाम लेते हो ,पता ही नहीं चलता,
इसीलिए खुद को तन्हा भी ,तो नहीं कह सकती ना में,
तुम्हारा अहसास भर ,रोज़ मुझे चंद साँसे दे जाता है,
तुम्हे जीने के लिए ,
तुम में ,खुद को फिर से ढूंढ लाने के लिए,
तुम्हारे नज़दीक आने के लिए,
जब तुम छू लेते हो ,मेरे नर्म ,गर्म होंठों को ,
बस आज मुझे मर जाने दो अपनी बाहों में ,
बस एक बार,
बस इस बार,
बस आखिरी बार....

Thursday, July 1, 2010

~: शब्द :~


आज कुछ शब्द खुद के लिए बो देना चाहती हूँ
शायद कोई फूल, कोई शाख खिल उठे मेरे लिए
जानती हूँ,
उगा रही हूँ, बंजर जमीन पर
उगेगा तो क्या अंकुरित भी नहीं हो पायेगा
लेकिन अपने तसल्ली के लिए उगा लेना चाहती हूँ
अपने खबाब के बंजर जमीन पर
कुछ शब्द अपने लिए
जिन्हें आज तक बोया तो बहुत बार
लेकिन काटने की रुत आने से पहले ही मुरझा जाते हैं
शायद मेरे आँखों का पानी कम हो गया
उन्हें सींचने के लिए
चलो फिर से कोई घाव दे दो मुझे
ताकि नयनों का नीर सूखने न पाए
मेरे शब्दों का पौधा मुरझाने न पाए............

Tuesday, May 25, 2010

क्यूंकि सुखा पत्ता हूँ...

तन्हा तन्हा फिरता हूँ ,
क्यूंकि सुखा पत्ता हूँ,

घर तो लगता अपना ही है,
पर दीवारों से डरता हूँ,


जी रहे हैं सभी यहाँ,
में तो पल पल मरता हूँ,

तुम ठहरे रिश्तों के शहंशाह,
में तो अहसास का पुतला हूँ,

वो बिका तो किसी एक का हो गया ,
में तो बिकने के बाद भी बिकता हूँ,

इक बार जो आया तूफ़ान गुलशन में,
अब तक दर दर भटका हूँ,

नहीं आयूंगा लौट कर कभी बहार में,
फिर भी फुहार की हसरत रखता हूँ,

क्यूंकि सुखा पत्ता हूँ.

Monday, April 26, 2010

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो!


जब मै रूठ जाती हूँ
और तब तुम मुझे अपनी जान बताते हो
में तो मर ही जाती हूँ
तुम मुझे कैसे जिन्दा पाते हो!

जब मैं सोती हूँ तुम्हारे सीने पर सर रख कर
तुम पलकों पर मेरी वही खबाब सजाते हो
मैं तो मर ही जाती हूँ
तुम मुझे कैसे जिन्दा पाते हो!

जब तुम मेरे गले मै बाहें डालते हो और मैं खो जाती हूँ
तब तुम मेरे आँखों मै उतर कर दिल मै समां जाते हो
मैं तो मर ही जाती हूँ
तुम मुझे कैसे जिन्दा पाते हो !

जब तुम मेरी चोटी बनाते हो
और ओंठो से मरे गर्दन सहलाते हो
मैं तो मर ही जाती हूँ
तुम मुझे कैसे जिन्दा पाते हो!

रोज मुझे चाँद
और खुद  को मेरा महबूब बतलाते हो
मैं तो मर ही जाती हूँ
तुम मुझे कैसे जिन्दा पाते हो!

जब तुम अपने हाथो से बिंदिया,
और मेरी मांग सजाते हो
मैं तो मर ही जाती हूँ
तुम मुझे कैसे जिन्दा पाते हो !

कतरा कतरा बिखर जाती हूँ रात भर तेरी बाँहों मै,
फिर भी तुम मुझे सुबह तक समेट लाते हो
मैं तो मर ही जाती हूँ
तुम मुझे कैसे जिन्दा पाते हो......!!






Wednesday, March 24, 2010

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो...

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My NotesNotes About MeDrafts
mann to jalta hi hai , kyun ko tan bhi jala dete ho...Share
Mon at 4:52pm | Edit Note | Delete
mere labon ko choo kar kyun aag laga dete ho,
mann to jalta hi hai ,kyun tan ko bhi jala dete ho.

shama jalai thi maine roshni k liye ,
tum hath badha kar kyun use bujha dete ho,
mann to jalta hi hai ,kyun tann ko bhi jala dete ho,

ye jism pighal raha hai katra katra karke,
kyun boond boond pilaate ho, ..
mann to jalta hi hai ,kyun tan ko bhi jala dete ho.

din bhar rahte ho khayalon main, raaton ko bhi jagate ho,
mann to jalta hi hai ,kyun tan ko bhi jalate ho.

jab bhi kabhi tanhaai mein sochti hun tumne,
kyun mere kaan mein kuchh gunguna dete ho,
mann to jalta hi hai kyun tan ko bhi jala dete ho.

jab bhi kuch puchna chahti hoon tumse,
mujhe neelam ,aur khud ko masoom bata dete ho,
mann to jalta hi hai , kyun ko tan bhi jala dete ho.

main "JEET" jaati hun har ek musibat se magar,
jaane kaise tum mujhe hara jaate ho.
mann to jalta hi hai kyun tan bhi jala dete ho.
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Manoj Joshi, Dr. Rajeev Shrivastava, Vijay Krishna Mishra and 3 others like this.
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Neelu Sharma Manoj ji bahut bahut shukriya.
about an hour ago ·

Neelu Sharma Neelima ji...jarra nawaazi ka bahut bahut shukriya.
about an hour ago ·

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो.........Share
Friday, March 19, 2010 at 1:03pm | Edit Note | Delete
जब मैं रूठ जाती हूँ ,
और तब तुम मुझे अपनी जान बताते हो ,
मैं तो मर ही जाती हूँ ,
तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब मैं सोती हूँ तुम्हारे सीने पर सर रख कर ,
तुम पलकों पर मेरी फिर वही खवाब सजाते हो ,
मैं तो मर ही जाती हूँ ,
तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब तुम मेरे गले मैं बाहे डाल देते हो,और मैं खो जाती हूँ
तब तुम मेरी आँखों से उतर कर मेरे दिल मैं समां जाते हो ,
मैं तो मर ही जाती हूँ ,
तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब तुम मेरी चोटी बनाते हो,
और होंठों से मेरी गर्दन को सहलाते हो ,
मैं तो मर ही जाती हूँ,
फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

रोज मुझे चाँद ,
और खुद को मेरा महबूब बतलाते हो,
मैं तो मर ही जाती हूँ ,
फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब तुम अपने हाथों से बिंदिया ,
और मेरी मांग सजाते हो,
मैं तो मर ही जाती हूँ,
फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

कतरा कतरा बिखर जाती हूँ रात भर तुम्हारी बाहों मे ,
फिर भी तुम मुझे सुबह तक समेट लाते हो,
मैं तो मर ही जाती हूँ,
फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,


रात भर मुझ पर बेशुमार प्यार लुटाते हो,
सुबह होते ही खुद को मासूम और मुझको नीलम बताते हो,
मैं तो मर ही जाती हूँ ,
फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो.

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो...

जब मैं रूठ जाती हूँ ,
और तब तुम मुझे अपनी जान बताते हो ,
मैं तो मर ही जाती हूँ ,
तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब मैं सोती हूँ तुम्हारे सीने पर सर रख कर ,
तुम पलकों पर मेरी फिर वही खवाब सजाते हो ,
मैं तो मर ही जाती हूँ ,
तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब तुम मेरे गले मैं बाहे डाल देते हो,और मैं खो जाती हूँ
तब तुम मेरी आँखों से उतर कर मेरे दिल मैं समां जाते हो ,
मैं तो मर ही जाती हूँ ,
तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब तुम मेरी चोटी बनाते हो,
और होंठों से मेरी गर्दन को सहलाते हो ,
मैं तो मर ही जाती हूँ,
फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

रोज मुझे चाँद ,
और खुद को मेरा महबूब बतलाते हो,
मैं तो मर ही जाती हूँ ,
फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब तुम अपने हाथों से बिंदिया ,
और मेरी मांग सजाते हो,
मैं तो मर ही जाती हूँ,
फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

कतरा कतरा बिखर जाती हूँ रात भर तुम्हारी बाहों मे ,
फिर भी तुम मुझे सुबह तक समेट लाते हो,
मैं तो मर ही जाती हूँ,
फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,


रात भर मुझ पर बेशुमार प्यार लुटाते हो,
सुबह होते ही खुद को मासूम और मुझको नीलम बताते हो,
मैं तो मर ही जाती हूँ ,
फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो.

Wednesday, March 3, 2010

tu yahin tha ab kahin nahi hai..

Tu raha hai paas sada hi ,
dur jab se gaya hai,

ik saya apna mere sath chor gaya hai,

main sagar ki uthati girti lahron main, tujhe dhundhati hoon,
tu chain ki neend kisi aur kinaare soya hai,

abhi tak to tha sath hamare ,
fir ab itna dur kyun ho gaya hai.

tu phulon main hai, kaliyon main hai,
tu baag aur chaman ki galiyon main hai,

teri khushboo se mann mera, meri akhiyon ko bhigota hai,

kabhi dikhta hai , kabhi fir chip jata hai,
abhi mila tha tu mujhse ,abhi gum ho jata hai.

hawa kuch yun chukar gayi hai mujhko,
jaise sparsh ho tera wahi apna saa.

ab aandhi ki tarah tu aankhon se ojhal ho gaya hai,

wo ghar tera hai wo basti bhi teri hai,
tu nahi hai yahan fir bhi chal rahi grahasthi teri hai,

har aahat pe laga k tu yahin hai yahin kahin hai,
doud k chaha pakdna ,lekin..

tu yahin tha ab kahin nahi hai,

kahin nahi hai.
तुम खवाब बनकर आयो तो नींद आ जाये,
आगोश मैं अपनी सुलाओ तो नींद आ जाये,

चूम लो अपने होठों से मेरी खामोश आँखों को ,
मेरी पलकों पर वही खवाब सजाओ तो नींद आ जाये,

तुम छु लो फिर गुज़रे ज़माने की तरह,
अहसास वही फिर से जगाओ तो नींद आ जाये.

मैं शमा बन तनहा जलती हूँ रोज रातों मैं,
तुम परवाना बन मुझसे लिपट जायो तो नींद आ जाये.

खून बहता है पानी बन रगों मैं मेरी,
तुम नस नस मैं समां जायो तो नींद आ जाये,

खामोश हूँ मैं किसी गुज़रे फ़साने की तरह,
मुझे ग़ज़ल की तरह ,तुम गुनगुनाओ तो नींद आ जाये.

मासूम तो हूँ मैं भी ,मगर नीलम की तरह ,
तुम भी मेरे लिए बदल जायो तो नींद आ जाये.

आज आग मेरी नस नस मैं लगाओ तो नींद आ जाये,
आगोश मैं अपनी सुलाओ तो नींद आ जाये.
तू मुझसे मिला भी है नहीं भी
तुझसे मुझे गिला भी है नहीं

इस तन्हाई के सफर में
तू साथ चला भी है नहीं भि

वो लहरों का साहिल से मिलना
हुआ भी है नहीं भी

इस पूरनमासी की रात
चांद खिला भी है नहीं भी

कल जो पतझड़ था
वो आज सावन है नहीं भी

जो देखे ख्वाब आंखों ने
वो रात आज भी है नहीं भी

जो बातें मैंने कही तुमसे
वो बातें तुमने सुनी भी है नहीं भी

बदल गई है मेरी शब्दावली
तू मेरा गीत भी है गजल भी

जो कहानी थी मेरी वही
आज तुम्हारी भी है मेरी भी.
खुद जली और मुझको भी जला गयी होली,

राज कई जलाए होली मैं

हर बार बची राख में चिंगारी से, वो राज फिर भी बचा गयी होली,

अपने जिस्म को रंगा मैंने लाल पीले ,नीले रंगों से,

हर रंग को मेरे आंसुओं मैं फिर से बहा गयी होली,

खुद भी जली ,जल कर अपनी राख सा, मुझे भी राख बना गयी होली.

सोच रही थी इस होली पर हो जायुंगी आशा ,

लेकिन नीलम होने का अहसास फिर से करा गयी होली .
मै आज भी तनहा हू,
यकीन नही आता तो यकीन दिलाइये मुझे,

अब फ़िर से आये हो तो ,
एक बार फ़िर से जाकर बताइये मुझे,

अजब गम ज़दा हू मै, आज तक सहला रही हू जख्मो को
इक और नया जख्म दे जाइये मुझे,

मै बहा रही हू आज भी कतरा कतरा आसू,
हो सके इस बारिश से बचाइये मुझे,

बहुत दिनो से मै रास्ते का बेकार सा पत्थर हू,
अब तो मील का पत्थेर बनाइये मुझे,

मै चाहती हू अब तुम सोने कि मुझे दे दो इज़ाज़त ,
इस चिता से अब ना जगाइये मुझे ,

तुम बसे हो राज़ कि तरह आज भी मेरे दिल मे,
आप भी नीलम सा अब ना दुनिया से चुपाइये मुझे

Thursday, February 25, 2010

सपना सपना ही रहने दो,

सपना सपना ही रहने दो,
सपने मैं ही सही तुम्हे अपना कहने दो,

तुम्हें मुबारक हो घर अपना
दीवारों से मुझको लिपटा रहने दो,

महफ़िल में गाना तुम गीत अपने ,
ग़ज़ल मेरी है मुझे ग़ज़ल कहने दो,

लहरों ने छुआ साहिल को कई बार,
मुझे तुम्हारा अहसास ही रहने दो,

खामोश हैं लब मेरे तो कोई बात नहीं ,
कहते है कहानी आँखों के अश्क उन्हें कहने दो,

मील के पत्थर बताते हैं मंजिल का पता.
पत्थर ही सही उसे मेरा हम सफ़र रहने दो,

सब कह लेते है जज़्बात अपनी जुबान से,
कलम मेरी भी कुछ कहती है उसे कहने दो.

इंतज़ार की हद्द बाकी है अभी,
आँखों को मरने के बाद भी खुला रहने दो,

सपना सपना ही रहने दो,
सपने मैं ही सही तुम्हे अपना कहने दो.

है भी नहीं भी -----

है भी नहीं भी -----
तू मुझसे मिला भी है नहीं भी
तुझसे मुझे गिला भी है नहीं

इस तन्हाई के सफर में
तू साथ चला भी है नहीं भि

वो लहरों का साहिल से मिलना
हुआ भी है नहीं भी

इस पूरनमासी की रात
चांद खिला भी है नहीं भी

कल जो पतझड़ था
वो आज सावन है नहीं भी

जो देखे ख्वाब आंखों ने
वो रात आज भी है नहीं भी

जो बातें मैंने कही तुमसे
वो बातें तुमने सुनी भी है नहीं भी

बदल गई है मेरी शब्दावली
तू मेरा गीत भी है गजल भी

जो कहानी थी मेरी वही
आज तुम्हारी भी है मेरी भी

apni neendon ko mujh par wara karta hai..

har pal har gazal main wo baat karta hai meri,
har gazal ko wo mere liye geet ki tarah rakhta hai,

wo masoom to nahi hai kisi bhi taraha,
magar har baat se bekhabar khud ko rakhta hai,

puchta hai wo baat mere dil ki aksar mujhse,
apne dil ki baat wo aksar apne dil hi main rakhta hai,

shaam dhale ya subah jaage ,
main soyi rahti hoon uski hi baahon mai,

wo jaag jaag kar meri zulfon ko sawara karta hai,

wo khud bhi doob jata hai bahut,
aur mujhko bhi gahre main utara karta hai,

main rang gayi hoon uske hi rang mai iss kadar,
jaise rang raje purane duppate ko nikhara karta hai,

chaand taare bhale na laa saka wo mere liye,
wo khud ko jala meri raahon main ujala karta hai,

wo pal pal mere liye sanwara karta hai,
apni neendon ko mujh par wara karta hai

thakan...

Palko par tut te khawabo ki thakan

labo par dum todti muskurahat ki thakan

ye khanak thi teri yaadon ki dil main,

mere dil ko har pal jhakjhorti teri yadon ki thakan

thak jaati to ruk jaati kisi moud par,

chalte chalte manzil k kho jane ki thakan.

Monday, February 8, 2010

तुम भले मुझको जलाओ शमा की मानिंद,
तुम जलो परवाना बन मुझे अच्छा नहीं लगता,

सफ़र मैं बैठी हूँ इंतज़ार मैं तेरे,
तुम अनजान बन नजदीक से गुज़र जायो अच्छा नहीं लगता ,

अच्छा तो लगता है तेरा अहसास भी,
मगर तू नहीं है पास ये मुझे अच्छा नहीं लगता,

लोग हंसते हैं मेरे जख्मों पर,
तुम भी मुस्कुराओ मुझे अच्छा नहीं लगता,

जाम पियो भले मेरी आँखों से तुम सुबह शाम,
शराबी कहलाओ सरे आम मुझे अच्छा नहीं लगता ,

तुम रहते हो ख्यालों में हार घडी,
खवाबों में ना आयो ये अच्छा नहीं लगता,

इतने आ जयो करीब ,कोई दुरी न रहे,
प्यार में रहे होश -ओ-हवास ये अच्छा नहीं लगता,

तुम पूछते हो कहानी मेरी,
फ़साना अपना न सुनाओ,ये अच्छा नहीं लगता,

कट तो जाता है वक़्त लेकिन,
लम्हा लम्हा मौत आये मुझे ,अच्छा नहीं लगता,

मेरे दर्द भरे नगमे गुनगुनाओ भले,
उनपर तुम करो वाह वाह ,मुझे अच्छा नहीं लगता.