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Saturday, November 19, 2011

ख़लल ...





     जाने क्यूँ ख़लल डाल जाती हैं उसकी यादें मेरी ज़िन्दगी में ,
     मैंने तो उसे यूँ कभी ख़्वाबों में भी परेशां किया ना था !!
.[नीलम ] 

Sunday, July 24, 2011

~:कुछ शेर और मुक्तक:~




















कुछ शेर और मुक्तक अर्ज़ कर रही हूँ .आशा करती हूँ जिस तरह आपने मेरे कविताओं को सराहा है और मेरा हौसला बढाया है उसी तरह आप मेरे शेरो शायरी को भी सराहेंगे और मेरा मार्ग दर्शन करेंगे.. अगर कोई गुस्ताखी हो जाए तो मुझे क्षमा कर दीजियेगा ...



१)... आँखों के अश्क बह नहीं पाए, ,

खामोश रहे किसी से कुछ कह नहीं पाए,

किस से कहते दास्ताँ अपने दिल की,

जो था अपना उसे अपना कह नहीं पाए.

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२).जब भी रातों मे तेरी याद आती है ,

वीरान रातों में चाँदनी उतर आती है,

सोचती हूँ तुम मिलोगे खवाबों मे,

मगर ना तुम आते हो ना नींद आती है.

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३)मेरी तनहाइयाँ भी अब गुनगुनाने लगी हैं,

हाथों की चूडियाँ कुछ बताने लगी हैं,

ये खनक है शायद उनके आने की,

जिनकी याद में तू अब मुस्कुराने लागी है.



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4).अपने अश्कों को छलकाना चाहती हूँ,

तुझे अपने सीने से लगाना चाहती हूँ,

जहाँ मिलती है ज़मी आसमा से ,

वहां अपना आशियाना बनाना चाहती हूँ.


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5)रात ढलती गयी ,

दिन भी गुज़रता गया,

उस से मिलने की उम्मीद का,

ये पल भी फिसलता गया.


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चंद शेर अर्ज़ हैं......

१). ना जाने वो कौन लोग थे जिनके ज़ख्म वक़्त भर गया,

हमे तो हर सुबह इक नया ज़ख्म दे जाती है ज़िन्दगी.

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२). खफ़ा भी नहीं हूँ और इस गम से जुदा भी नहीं हूँ,

वजूद तो मेरा भी है यहाँ वहां फिजाओं मे, सिमटी हूँ अभी बिखरी नहीं हूँ


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३). देखिये मेरे इंतज़ार की हद्द है कहाँ तक,

मरने के बाद भी मेरी आँखे खुली रखना.

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४).यूँ ही मुस्कुराती और गुनगुनाती हूँ मैं,

कितना है दर्द दिल मैं खुद से भी छुपाती हूँ मैं.

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5).आन्धिओं मे कहाँ दम था गिरा जाती वो मुझे शाख से,

उसकी हसरत - ए -बहार की खातिर खुद टूट कर गिरा हूँ मैं.


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6).यूँ तो फुर्सत ही फुर्सत है ज़िन्दगी मे,लेकिन

इन दिनों खुद को जिंदा रखने मे बहुत मसरूफ हूँ मैं.


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Wednesday, May 18, 2011

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात.....







likh dala hai naam tumhara panno par, 
ro padi to mit jaayegi meri jhooti aas ,

jao mujhe nahi karni aab tumse koi baat.

chhoo jaate ho kyun ahsaas bankar,
kisi din jal kar ban jayungi main rakh.


jao mujhe nahi karni tumse koi baat

katra katra yunhi bikharti rahi agar mai....!
to rah jaayungi ek din main ban kewal laash 


jao mujhe nahi karni tumse koi baat,


milte nahi ho khaayaaalon main bhi theek se,
de jaate ho adhi adhuri pyaaas,


jao mujhe nahi karni tumse koi baat.

kitna sataate ho aa ake khawabon main,
kyun de jaate ho ek tooti hue si आस,



jao mujhe nahi karni tumse koi baat.

kyun jalate ho umeedon ke diye, 
lag jati meri sukhi choukhat par aag.

jao mujhe nahi karni tumse koi baat.
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लिख डाला है नाम तुम्हारा पन्नो पर ,
रो पड़ी तो मिट जायेगी मेरी झूठी आस,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात,

छू जाते हो क्यूँ अहसास बनकर ,
किसी दिन जलकर बन जयुंगी मैं राख ,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात,

कतरा कतरा यूँही बिखरती रही अगर मैं,
तो रह जयुंगी इक दिन मैं बन केवल लाश ,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात,

मिलते नहीं हो खयालो में भी ठीक से,
दे जाते हो आधी अधूरी प्यास,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात,

कितना सताते हो आ आ के ख्वाबो में,
क्यूँ दे जाते हो टूटी  हुई सी इक आस,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात,

क्यूँ जलाते हो उमीदो के दिए ,
लग जाती हाई मेरी सुखी चौखट पर आग,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात.

[नीलम]

Tuesday, May 3, 2011

चुप हो जा मुझसे मत कहना...




चलते चलते थक गयी हूँ,
कब तू छोड़ गया मेरा साथ ,किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

इक उम्मीद तेरे आने की, 
मैं उसमे जलायुं अपने दिन और रात,किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

इक दर्द उठा तेरे सीने में,
मेरे दिल के भी है दर्द हज़ार ,किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

छलक जाते हैं तेरी आँखों के भी आंसूं ,
मेरी पलकों की बिन बदली बरसात , किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

इक करवट उधर तू बदले,
इधर मैं बदलू करवट बार बार, किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

इक तनहा चाँद तेरे अंगान का,
मेरे भी आँगन मैं टूटे तारे हज़ार ,किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

कब दामन छुटा, कब आस टूटी ,किसी से मत कहना,
ये राज की है बात,ये राज़ किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

मैं यूँही बैठी रही तेरी दहलीज़ पर ,
कब ,किस दिन टूटी नीलम की आस, किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,
[नीलम]

Monday, May 2, 2011

चुप हो जा .मत कहना ...


>>>>में रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना<<<<,


चलते चलते थक गयी हूँ,
कब तू छोड़ गया मेरा साथ ,किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

इक उम्मीद तेरे आने की, 
मैं उसमे जलायुं अपने दिन और रात,किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

इक दर्द उठा तेरे सीने में,
मेरे दिल के भी है दर्द हज़ार ,किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

छलक जाते हैं तेरी आँखों के भी आंसूं ,
मेरी पलकों की बिन बदली बरसात , किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

इक करवट उधर तू बदले,
इधर मैं बदलू करवट बार बार, किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

इक तनहा चाँद तेरे अंगान का,
मेरे भी आँगन मैं टूटे तारे हज़ार ,किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

कब दामन छुटा, कब आस टूटी ,किसी से मत कहना,
ये राज की है बात,ये राज़ किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

मैं यूँही बैठी रही तेरी दहलीज़ पर ,
कब ,किस दिन टूटी नीलम की आस, किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,
[नीलम]

Friday, February 18, 2011

लफ्ज़




आज वो फिर आई थी,


कुछ बिखरे ,कुछ उलझे हुए लफ्ज़ लेकर ,

और जाते हुए मुझसे कह गयी,

अपने बिखरे हुए लफ्ज़ समेटने को,

और साथ ही सवाल भी कर गयी...

क्या समेट पायोगे मेरे बिखरे,उलझे लफ्ज़...

शायद उसे अहसास ही नहीं,

के में खुद कितना बिखरा हुआ हूँ,

लेकिन ,फिर भी हर बार की तरह,

इस बार भी कोशिश कर रहा हूँ,

उसके बिखरे,उलझे लफ़्ज़ों को समेटने की,

जिन्हें वो गीत की तरह गाना चाहती है,

ग़ज़ल की तरह गुनगुनाना चाहती है,

उसका एक एक लफ्ज़ मेरी नसों में बह रहा है लहू बन कर,

उसके बिखरे लफ़्ज़ों को लिखता हूँ उसके लिए,

जी तो बहुत चाहता है....

के वो भी कभी मेरे बिखरे लफ़्ज़ों को समेटे,

मगर ,कह नहीं पता,

क्युंकी में उसे टूटते हुए नहीं देखना चाहता,

नहीं चाहता की वो भी बिखर जाए मेरी तरह,

इसलिए हर बार की तरह,

खुद को उसके लफ़्ज़ों में समेट उसकी नज़र कर देता हूँ,

जिन्हें पढ़ कर वो अपनी बेजान मुस्कुराहटों को सेंक लेती है,

कुछ पल के लिए,

और उस वक़्त उसके खामोश से लब,

कुछ समेटे हुए लफ्ज़ मेरे लिए कह जाते हैं,

और फिर से वादा कर जाती है जाते हुए...

फिर से बिखरे हुए लफ्ज़ दे जाने का,

और कह जाती है...

कल तुम मेरे लफ्ज़ नहीं,

मुझे समेट लेना,

खुद में,

ताकि में फिर कभी मै बिखरे लफ्ज़ लेकर ना आयूँ,

क्युंकी मैं जान गयी हूँ,

तुम अब मुझको खुद में समेट चुके हो.
 

Thursday, February 10, 2011

शब्द कहाँ से लाते हो...

शब्द कहाँ से लाते हो,
बातें तो सब मेरी ही होती हैं इनमे,
तुम उनको मेरी शक्ल कैसे दे पाते हो,
माना लफ्ज़ लफ्ज़ कहता है बात मेरी ,
तुम उनसे अपना मन कैसे बहलाते हो,
तुम मुझे कभी चाँद कहते हो ,कभी ख्वाब कहते हो,
फिर तुम मेरे साथ कब और कैसे सो पाते हो,
आगोश में तो मैं होती हूँ तुम्हारी ,
फिर तुम खुद को मेरी आगोश में कैसे पाते हो,
कभी मेरी ज़ुल्फ़ कभी मेरा चेहरा सहलाते हो,
कभी हाथ ओर कभी होंठो से मुझे नहलाते हो,
मै पिघल कर बिखर जाती हूँ रात भर कतरा कतरा करके,
फिर तुम सुबह तक मुझे कैसे समेट लाते हो,
तुम्हारी बाहों में रात कटे या सवेरा जागे ,
तुम मुझे कैसे मीठी नींद सुलाते हो,
चाँद की बिंदी ओर सितारों से मेरी मांग सजाते हो ,
तुम जब भी छूते हो मैं बेहोशी में होती हूँ,
फिर तुम ओर छू कर मुझे होश में लाते हो,
पास आ तो जायुं मैं भी तुम्हारे लेकिन ....
मैं भी जल जाती हूँ ,और तुम भी झुलस जाते हो,
कहते हो खुद को मासूम ,ओर राज बन मेरे दिल मैं उतर जाते हो,
सुबह होते ही तुम खुद को मासूम और मुझे नीलम बताते हो.
ये सारे शब्द कहाँ से लाते हो.

Friday, February 4, 2011

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो.



जब मैं रूठ जाती हूँ ,


और तब तुम मुझे अपनी जान बताते हो ,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब मैं सोती हूँ तुम्हारे सीने पर सर रख कर ,

तुम पलकों पर मेरी फिर वही खवाब सजाते हो ,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,


जब तुम मेरे गले मैं बाहे डाल देते हो,और मैं खो जाती हूँ

तब तुम मेरी आँखों से उतर कर मेरे दिल मैं समां जाते हो ,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,



जब तुम मेरी चोटी बनाते हो,

और होंठों से मेरी गर्दन को सहलाते हो ,

मैं तो मर ही जाती हूँ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,


रोज मुझे चाँद ,

और खुद को मेरा महबूब बतलाते हो,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब तुम अपने हाथों से बिंदिया ,

और मेरी मांग सजाते हो,

मैं तो मर ही जाती हूँ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

कतरा कतरा बिखर जाती हूँ रात भर तुम्हारी बाहों मे ,

फिर भी तुम मुझे सुबह तक समेट लाते हो,

मैं तो मर ही जाती हूँ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,


रात भर मुझ पर बेशुमार प्यार लुटाते हो,

सुबह होते ही खुद को मासूम और मुझको नीलम बताते हो,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो.
 

Wednesday, January 12, 2011

मुस्कान

 
 
उस सुंदर सी मुस्कान के पीछे
आँखों से मोती झरते थे!

भीगे भीगे कुछ सपने थे,
कुछ टूटे ,कुछ छूटे अपने थे!

उस सुंदर सी मुस्कान के पीछे,
आँखों से मोती  झरते थे!

कुछ पिघले पिघले पल अपने थे,
कुछ लम्हे भी तो कल अपने थे!

उस सुंदर सी मुस्कान के पीछे ,
आँखों से मोती झरते थे!

राहों मे यूँही चलते चलते,
मजिल से पहले वो हमसे रूठ चुके थे!

उस सुंदर सी  मुस्कान के पीछे ,
आँखों से मोती  झरते थे!

तन उसका भी गीला था, मन मेरा भी भीगा था,
आँखों की बरसात के चलते!

उस सुंदर सी मुस्कान के पीछे ,
आँखों से मोती  झरते थे!