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Friday, February 18, 2011

लफ्ज़




आज वो फिर आई थी,


कुछ बिखरे ,कुछ उलझे हुए लफ्ज़ लेकर ,

और जाते हुए मुझसे कह गयी,

अपने बिखरे हुए लफ्ज़ समेटने को,

और साथ ही सवाल भी कर गयी...

क्या समेट पायोगे मेरे बिखरे,उलझे लफ्ज़...

शायद उसे अहसास ही नहीं,

के में खुद कितना बिखरा हुआ हूँ,

लेकिन ,फिर भी हर बार की तरह,

इस बार भी कोशिश कर रहा हूँ,

उसके बिखरे,उलझे लफ़्ज़ों को समेटने की,

जिन्हें वो गीत की तरह गाना चाहती है,

ग़ज़ल की तरह गुनगुनाना चाहती है,

उसका एक एक लफ्ज़ मेरी नसों में बह रहा है लहू बन कर,

उसके बिखरे लफ़्ज़ों को लिखता हूँ उसके लिए,

जी तो बहुत चाहता है....

के वो भी कभी मेरे बिखरे लफ़्ज़ों को समेटे,

मगर ,कह नहीं पता,

क्युंकी में उसे टूटते हुए नहीं देखना चाहता,

नहीं चाहता की वो भी बिखर जाए मेरी तरह,

इसलिए हर बार की तरह,

खुद को उसके लफ़्ज़ों में समेट उसकी नज़र कर देता हूँ,

जिन्हें पढ़ कर वो अपनी बेजान मुस्कुराहटों को सेंक लेती है,

कुछ पल के लिए,

और उस वक़्त उसके खामोश से लब,

कुछ समेटे हुए लफ्ज़ मेरे लिए कह जाते हैं,

और फिर से वादा कर जाती है जाते हुए...

फिर से बिखरे हुए लफ्ज़ दे जाने का,

और कह जाती है...

कल तुम मेरे लफ्ज़ नहीं,

मुझे समेट लेना,

खुद में,

ताकि में फिर कभी मै बिखरे लफ्ज़ लेकर ना आयूँ,

क्युंकी मैं जान गयी हूँ,

तुम अब मुझको खुद में समेट चुके हो.
 

Thursday, February 10, 2011

शब्द कहाँ से लाते हो...

शब्द कहाँ से लाते हो,
बातें तो सब मेरी ही होती हैं इनमे,
तुम उनको मेरी शक्ल कैसे दे पाते हो,
माना लफ्ज़ लफ्ज़ कहता है बात मेरी ,
तुम उनसे अपना मन कैसे बहलाते हो,
तुम मुझे कभी चाँद कहते हो ,कभी ख्वाब कहते हो,
फिर तुम मेरे साथ कब और कैसे सो पाते हो,
आगोश में तो मैं होती हूँ तुम्हारी ,
फिर तुम खुद को मेरी आगोश में कैसे पाते हो,
कभी मेरी ज़ुल्फ़ कभी मेरा चेहरा सहलाते हो,
कभी हाथ ओर कभी होंठो से मुझे नहलाते हो,
मै पिघल कर बिखर जाती हूँ रात भर कतरा कतरा करके,
फिर तुम सुबह तक मुझे कैसे समेट लाते हो,
तुम्हारी बाहों में रात कटे या सवेरा जागे ,
तुम मुझे कैसे मीठी नींद सुलाते हो,
चाँद की बिंदी ओर सितारों से मेरी मांग सजाते हो ,
तुम जब भी छूते हो मैं बेहोशी में होती हूँ,
फिर तुम ओर छू कर मुझे होश में लाते हो,
पास आ तो जायुं मैं भी तुम्हारे लेकिन ....
मैं भी जल जाती हूँ ,और तुम भी झुलस जाते हो,
कहते हो खुद को मासूम ,ओर राज बन मेरे दिल मैं उतर जाते हो,
सुबह होते ही तुम खुद को मासूम और मुझे नीलम बताते हो.
ये सारे शब्द कहाँ से लाते हो.

Friday, February 4, 2011

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो.



जब मैं रूठ जाती हूँ ,


और तब तुम मुझे अपनी जान बताते हो ,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब मैं सोती हूँ तुम्हारे सीने पर सर रख कर ,

तुम पलकों पर मेरी फिर वही खवाब सजाते हो ,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,


जब तुम मेरे गले मैं बाहे डाल देते हो,और मैं खो जाती हूँ

तब तुम मेरी आँखों से उतर कर मेरे दिल मैं समां जाते हो ,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,



जब तुम मेरी चोटी बनाते हो,

और होंठों से मेरी गर्दन को सहलाते हो ,

मैं तो मर ही जाती हूँ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,


रोज मुझे चाँद ,

और खुद को मेरा महबूब बतलाते हो,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब तुम अपने हाथों से बिंदिया ,

और मेरी मांग सजाते हो,

मैं तो मर ही जाती हूँ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

कतरा कतरा बिखर जाती हूँ रात भर तुम्हारी बाहों मे ,

फिर भी तुम मुझे सुबह तक समेट लाते हो,

मैं तो मर ही जाती हूँ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,


रात भर मुझ पर बेशुमार प्यार लुटाते हो,

सुबह होते ही खुद को मासूम और मुझको नीलम बताते हो,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो.