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Wednesday, March 20, 2013

वही नजदिकिया ,





वही नजदीकियां ,
वही फांसले भी थे ,
रहे क़दमों के निशाँ मिटते मगर ,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया...

वही रस्मे...
वही रवायतें भी निभती रहीं ,
भीड़ में रहे दोनों मगर,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया...

कभी शर्म -ओ- हया ,
कभी तपिश-ए-बदन,
रहे जलते -बुझते दोनों मगर ,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया...

वही झुकी पलकें मेरी रहीं ,
वही ख्वाब मेरा तेरे तकिये तले,
रहे जागते दोनों मगर ,इज़हार न तूने किया न मैंने किया,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया...

ज़माने की खातिर मैं हो गयी बे-वफ़ा,
बिन मिले बिछड़े दोनों मगर,
ना अपने हिस्से का प्यार मैंने किया न तूने किया,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया.....[नीलम]
 — 

Wednesday, March 13, 2013

ये मेरी साँसे बस तुम्हारे लिये...



ये राते ..
ये मेरी साँसे बस तुम्हारे लिए..

तुम दूर हो तो क्या ..
ये सारी बातें बस  तुम्हारे लिए..

गाती हूँ ग़ज़ल ,
लेकिन गुनगुनायुंगी ये गीत बस तुम्हारे लिए..

मेरी आँखों का सुहाना ख्वाब है तू,
लेकिन आँखों मे कटेगी हर रात बस तुम्हारे लिए,...

ये रिश्ते ये नाते है सबके लिए ,
लेकिन ये अहसास का  सम्बंध तुम्हारे लिए ....

ये जिस्म है सिर्फ उसका ,
लेकिन इसमें बसी जान बस तुम्हारे लिए,...

पतझड़ का फूल हूँ मैं,
लेकिन बसंत की बहार हूँ बस तुम्हारे लिए..

धधकती लो हूँ शमा की मगर ,
पिघलता मोम हूँ बस तुम्हारे लिए...

मेरी मुस्कुराहटो पर ना जायो ,
इनमे छिपा हर अश्क बस तुम्हारे लिए..

बेवफा हूँ तो क्या हुआ,
ये वादा खिलाफी की मैंने बस तुम्हारे लिए...

ये राते ..
ये मेरी सांसे बस तुम्हारे लिए,...

तुम दूर हो तो क्या..
ये सारी बातें बस तुम्हारे लिए...[नीलम]

Sunday, March 10, 2013

यहीं तो हूँ मैं ...


****
यहीं तो हूँ मैं****




यहीं तो हूँ मैं,
कहाँ जा सकती हूँ अब,
कहीं भी तो नहीं,
बस खुद को खुद में,
तो कभी तुम में ,
खुद को तलाशती रहती हूँ ,
जो साया तुम्हारे पीछे है,
कहीं वो मेरा तो नहीं,
या शायद,
जो साया मेरे साथ है,
वो तुम्हारा तो नहीं,
बस यूँही भटकती रहती हूँ मैं अक्सर अंधेरों में ,
लेकिन देखो ना ,
फिर भी गुम नहीं हो पाती हूँ मैं,
क्यूंकि तुम मुझे ढूंढ ही लाते हो,
कभी ख्यालों में,
कभी खवाबों में,
तुम कब हाथ थाम लेते हो ,
पता ही नहीं चलता,
इसीलिए खुद को तन्हा भी तो नहीं कह सकती हूँ में,
तुम्हारा अहसास भर रोज़ मुझे चंद साँसे दे जाता है,
तुम्हे जीने के लिए ,
तुम में ,
खुद को फिर से ढूंढ लाने के लिए,
तुम्हारे नज़दीक आने के लिए,
जब तुम छू लेते हो ,मेरे नर्म गर्म होंठों को ,
तब मैं मर कर भी जी उठती हूँ ,
तुम्हारी आगोश में,
क्यूँ तुम मुझे यूँही नहीं पड़े रहने देना चाहते ,
अपनी आगोश में ,
बस आज मुझे मर जाने दो,
अपनी बाहों में ,
बस एक बार,
बस इस बार,
बस आखिरी बार....[नीलम] —
 

Saturday, March 9, 2013

मर्द कभी नहीं रोते . . .

**** मर्द कभी नहीं रोते*****
   

मैं बचपन से सुनता आ रहा हूँ,
मर्द कभी नहीं रोते,
और मैं भी कभी नहीं रोया,
मर्द हूँ ना..
जब बहिन के पति का स्वर्गवास हुआ,
तब भी नहीं रोया था मैं,
जबकि जानता था मेरी बहिन का संसार लुट चूका है,
मगर बहिन और भांजे ,भांजियो की जिम्मेदारी जो उठानी थी,
अगर रोता तो कमजोर पड जाता ना मैं,
इसलिए नहीं रोया तब भी,
क्यूंकि जानता था ...
मर्द कभी नहीं रोते,
बेटी का उजड़ा घर देख पिता भी २ साल बाद चल बसे,
तब भी नहीं रोया था मैं,
माँ और छोटे बहिन ,भाई को भी तो संभालना था ना मुझे,
और जानता था,
मर्द कभी नहीं रोते,
इसलिए नहीं रोया था तब भी,
अभी पिता के शोक से उभर नहीं पाया था कि माँ भी चल बसी,
अब हिम्मत टूटने लगी थी ,
लेकिन नहीं रोया था तब भी मैं,
क्यूंकि बहनों, छोटे भाई और उनके बच्चों को जो संभालना था ,
उन्हें दिलासा जो देना था,
कि मैं हूँ ,तुम सबके साथ,
तुम्हारे सर पर रहेगा हमेशा मेरा हाथ ,
तुम्हारे हर सुख दुःख में हूँ मैं तुम्हारे साथ,
और जानता भी था ना...
कि मर्द कभी नहीं रोते,
इसलिए नहीं रोया था तब भी मैं,
बहुत कोशिश की ,
कि नहीं रोना है मुझे,
लेकिन अब मैं भी कमजोर पड़ने लगा था,
छुप छुप के अंधेरों में रोने लगा था,
लेकिन एक दिन अचानक सुबह दफ्तर में किसी का फोन आया,
मेरा दिल तब बहुत जोर से घबराया,
मैंने हिम्मत जुटा कर फोन उठाया ,
वहां से कोई बोला आपके छोटे भाई कि तबियत बहुत बिगड़ गई है,
और वो बार बार बस यही कह रहे हैं,
कि मेरे भाई को बुला दो,
उन्हें बोलो जल्दी से आके मुझे अपने सीने में छुपा ले,
और मैंने झट से फोन पटक दिया,
और बेतहाशा दफ्तर से निकल पड़ा,
जब तक मैं अस्पताल पहुंचा ,
मेरा भाई मुझे छोड़ के चल दिया था,
और मैं ...
बुत बना बस देख रहा था,
बहुत बार याद की बचपन की बात,
कि मर्द कभी नहीं रोते ,
मगर सबके जाने का दुःख अब मुझे तोड़ रहा था ,
हर कोई मुझे अकेला छोड़ कर चले जा रहा था,
और मैं खुद को बस समझा रहा था,
कि मर्द कभी नहीं रोते..
भाई कि पत्नी और उसके नन्हे से बच्चों कि जिम्मेदारी भी अब मुझ पर आन पड़ी है,
उनको भी अब अब संभालना होगा,
और ये दुःख मेरी बहनों से भी झेला ना जायेगा,
लेकिन अब तक जो समन्दर आँखों में बाँध रखा था,
क्यूंकि बचपन से ये मान रखा था ,
कि मर्द कभी नहीं रोते,
अब मैं ये भूल चुका था,
आंसुओं का झरना फूट पड़ा था.
जब भी छोटे भाई के आखिरी शब्द याद आते हैं,
मेरे भाई को बुला दो बस....
तब तब मैं हमेशा भूल जाता हूँ,
कि ..
मर्द कभी नहीं रोते.....
मर्द जब टूट जाता है,
उसका हर अपना जब छूट जाता है,
तब मर्द भी रोते हैं..[नीलम]
 —