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Sunday, March 10, 2013

यहीं तो हूँ मैं ...


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यहीं तो हूँ मैं****




यहीं तो हूँ मैं,
कहाँ जा सकती हूँ अब,
कहीं भी तो नहीं,
बस खुद को खुद में,
तो कभी तुम में ,
खुद को तलाशती रहती हूँ ,
जो साया तुम्हारे पीछे है,
कहीं वो मेरा तो नहीं,
या शायद,
जो साया मेरे साथ है,
वो तुम्हारा तो नहीं,
बस यूँही भटकती रहती हूँ मैं अक्सर अंधेरों में ,
लेकिन देखो ना ,
फिर भी गुम नहीं हो पाती हूँ मैं,
क्यूंकि तुम मुझे ढूंढ ही लाते हो,
कभी ख्यालों में,
कभी खवाबों में,
तुम कब हाथ थाम लेते हो ,
पता ही नहीं चलता,
इसीलिए खुद को तन्हा भी तो नहीं कह सकती हूँ में,
तुम्हारा अहसास भर रोज़ मुझे चंद साँसे दे जाता है,
तुम्हे जीने के लिए ,
तुम में ,
खुद को फिर से ढूंढ लाने के लिए,
तुम्हारे नज़दीक आने के लिए,
जब तुम छू लेते हो ,मेरे नर्म गर्म होंठों को ,
तब मैं मर कर भी जी उठती हूँ ,
तुम्हारी आगोश में,
क्यूँ तुम मुझे यूँही नहीं पड़े रहने देना चाहते ,
अपनी आगोश में ,
बस आज मुझे मर जाने दो,
अपनी बाहों में ,
बस एक बार,
बस इस बार,
बस आखिरी बार....[नीलम] —
 

2 comments:

  1. आपकी कविता में गहरी प्रेमासक्ति की अनुभूतिहै , अच्छा लगा, परन्तु आखरी पांच पंक्तिया-- मरने की बात न करें
    latest postअहम् का गुलाम (दूसरा भाग )
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  2. itna dard kyon bhar diya neelu jee :)

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