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Friday, June 30, 2017

क्यूँ सोचता हूँ तुम्हें...

तुम अक्सर सवाल करती हो
क्यूँ सोचता हूँ मैं तुम्हे
जरा पास आओ
बताना है आज
क्यूँ सोचता हूँ तुम्हे
तुम्हारी खनक भरी हंसी गूंजती है हर वक़्त मेरे कानो में
इसलिए सोचता हूँ तुम्हे
तुम्हारा अक्स मेरे दर-ओ - दीवार पर उभर आता है
इसलिए सोचता हूँ तुम्हे
रात की चाँदनी में चाँद बनकर जब मेरे ख्यालों की छत पर टहलती हो ना
तब सोचता हूँ तुम्हे
घने काले बादल जब घिर आते हैं
और जब बूंदों के साथ तुम भी मुझे भिगो जाती हो
तब सोचता हूँ तुम्हे
जब सुबह की पहली किरण मेरे सिरहाने तक आती है
और तुम छू लेती हो गुनगुने अहसास की तरह
तब सोचता हूँ तुम्हे
कहाँ खो गयीं तुम
उफ़्फ़!!! 
तुम फिर से सोचने लगी हो ना मुझे ...
[नीलम].

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