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Wednesday, October 5, 2016

घडियां इंतज़ार की

जानती हूँ
तुम आज भी कर रहे हो
इंतज़ार
और जी रहे हो
उम्मीद
और उम्मीदें इन्तजार को आसान बना देती हैं
और मैं ...
मैं जी रही हूँ
घडियां इंतज़ार की
तुम्हे खेल लगता है ना मेरा यूँ अचानक चले जाना
मगर
कहाँ जा पाई मैं तुम्हे छोड़ कर
मेरा जिस्म ही तो गया तुमसे दूर
मेरी रूह तो वहीं रह गई
तुम्हारे पास
जिसे तुम देखते ही नहीं
शायद तुम्हे मैं ज़िस्म के
साथ ही चाहिये थी
इसिलिये मेरी तुम में भटकती रूह छोड
तुम तलाश रहे हो
मेरा तुम बिन
बेजान जिस्म
नीलम

1 comment:

  1. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति...वाह !!!!

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