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Thursday, May 14, 2015
Tuesday, September 23, 2014
जब तुम नहीं होते ...
तुम्हरे होने पर होती हूँ मैं भी अपने साथ
जब तुम नहीं होते तो मैं खुद मैं भी बाकी नहीं रहती.
जब तुम नहीं होते तो मैं खुद मैं भी बाकी नहीं रहती.
_.[नीलम] —
मौन शब्द ..
मैं क्या कहूँ अब..
तुम ही कुछ कहो ना ..
तुम्हारे लबों पर ख़ामोशी कहाँ अच्छी लगती है
तुम्हारे खामोश होते ही ,
मेरी धड़कनों की आवाज़ शोर करने लगती है ..
तुम ही कुछ कहो ना ..
तुम्हारे लबों पर ख़ामोशी कहाँ अच्छी लगती है
तुम्हारे खामोश होते ही ,
मेरी धड़कनों की आवाज़ शोर करने लगती है ..
सवाल बहरे ,जवाब गूंगे . . . .
उफ़!!!!
तुम्हारे गूँजते सवाल
खामोश पड़े रहने दो ना इन्हे
जानते हो ना
जवाब नहीं दे पायूंगी मैं
क्यूंकि....
तुम्हारे सवाल बहरे
और ...
मेरे जवाब गूंगे.
तुम्हारे गूँजते सवाल
खामोश पड़े रहने दो ना इन्हे
जानते हो ना
जवाब नहीं दे पायूंगी मैं
क्यूंकि....
तुम्हारे सवाल बहरे
और ...
मेरे जवाब गूंगे.
Tuesday, September 16, 2014
आदत ...
देखो…
तुम जाने की बात तो करो मत ,
तुम जानते नहीं हो ....
अब तुम आदत हो गए हो मेरी ,
और तुम्हारी आदत …
जो एक बार लग गई ,
तो लग गई.
लाख कोशिशों के बाद भी ,
इसे बदल नहीं पायूँगी ,
या यूँ कहो ,
बदलना नहीं चाहती ,
इसलिए अब कभी जाने की बात ना करना,
बस अब साथ रहना ,
यूँही सही …
मगर मेरे आस पास...
क्यूंकि ...
अब तुम अजनबी भी तो नहीं रहे ना !!! _[नीलम ]_
Friday, May 2, 2014
"आखिरी झूठ".... ,
झूठ........
हाँ झूठ .
फिर से बोला एक और झूठ
आज मैं ने
"ख़ुद" से खुद ही,
खुद को समझाने की खातिर !
नहीं हारी मैं अब तक,
परिस्तिथियाँ कैसी भी हों
कैसा भी हो मौसम का मिज़ाज ,
बहुत "मज़बूत" हूँ मैं ,
एक और झूठ बोला मैं ने खुद से ------!
आहा !!!
कमाल हो गया ....
हो गया नई ऊर्जा का संचार
निखर - निखर संवर-संवर सी गई " मैं "
एक नया हौसला एक नई उमंग,
शुरू हो गयी फिर से एक नई जंग,
खुद से खुद को जुदा करने के लिए।
हार - जीत..
जीत - हार...
ज़िंदगी को देनी है नई रफ़्तार...
मगर खुद का" विश्वास" बढ़ाने के लिए ,
बस एक "आखिरी" झूठ ,
सबसे बड़ा झूठ ,
"उम्मीद " …
इसके बाद .....
किसी और "झूठ "की कोई जरुरत नहीं ,
इसी के सहारे तो बीत जाती है ,
सारी जिंदगी ……!!!
_[नीलम]_
Wednesday, April 16, 2014
आवाज़ें......
आवाज़ें ……
आवाज़ें मर जाती है
मगर ...
ज़िंदा रहती हैं खामोशियाँ
और खामोशियाँ
अक्सर शोर करती हैं
गूंजती हैं
सन्नाटों में
कभी महसूस करना तुम
तब
जब
तुम्हारे चारों ओर पसरा हुआ हो
ढेर सारा सन्नाटा
और हाँ...
तुम्हारे घर की दीवारों पर टंगी हुई हों
सिर्फ मेरी यादें .
आवाज़ें मर जाती है
मगर ...
ज़िंदा रहती हैं खामोशियाँ
और खामोशियाँ
अक्सर शोर करती हैं
गूंजती हैं
सन्नाटों में
कभी महसूस करना तुम
तब
जब
तुम्हारे चारों ओर पसरा हुआ हो
ढेर सारा सन्नाटा
और हाँ...
तुम्हारे घर की दीवारों पर टंगी हुई हों
सिर्फ मेरी यादें .
_[नीलम]_
Friday, February 21, 2014
विदा . . .
जो अपने थे मगर अपने नहीं थे, फिर भी अपनों से बढ़कर थे,
उनके चले जाने की कमी बेहद्द तक़लीफ़ देती हैं, क्यूंकि कई बार हम अपनों से भी वो सब साझा नहीं कर पाते जो करना चाहते हैं, और तब यही अपने जो अपने नहीं होते, फिर भी अपनों से बढ़कर लगते हैं,
क्यूंकि हम उन्हें कह पाते हैं अपने मन की हर ख़ुशी, हर दर्द ,
और जब यही अपने दूर बहुत दूर चले जाते हैं ,तब जो रिक्तता आती है जीवन में उसे कोई दूसरा भर नहीं पाता , तब बेहद्द अकेलापन महसूस होता है , और तब शब्दकोष का सबसे रुआंसा शब्द बन जाता है विदा......
मुश्किल होता है कह पाना ...
विदा....
जो शब्दकोष का सबसे ruy शब्द है ,
विदा शब्द ज़ेहन में आते ही तड़पने लगता है मन ,
विदा लेते ही छलकने लगती हैं आँखें ,
जाने क्यूँ ,
विदा ले लेने के बाद भी ,
शेष रह जाता है सब कुछ ,
जो किसी के चले जाने के बाद भी ,
गया हुआ नहीं लगता ,
लगता है तो बस इतना ,
जैसे रिक्त हो गया हो कोई स्थान ,
मगर रिक्त नहीं होती यादें,
और विदा होने के बाद भी रह जाते हैं शेष...
आंसूं ,यादें ,और स्पष्ट होते हुए चेहरे !!!! [नीलम]
(शब्दकोष का सबसे रुआंसा शब्द है विदा.....) ये लाईनें मैंने दीपक अरोरा जी की रचना में पढ़ीं थीं , उन्ही से प्रेरित होकर कुछ लिखने की कोशिश की है , या यूँ कहिये अपनों से विदा होने का दंश जो मैं भी झेल रही हूँ उसे शब्द देने कि कोशिश की है ……..
Thursday, February 13, 2014
Wednesday, February 12, 2014
टैग ...
टैग ..या ...साझा ..
मालूम है क्यूँ टैग करते हैं हम ..!!!!
मैंने कई मित्रों को अपने स्टेटस पर ये लिखने को मजबूर पाया की .. कृपया मुझे टैग ना करें अन्यथा टेग करने वाले को ब्लाक करना पड़ेगा...
अरे भाई क्यूँ..?
टैग करना कोई गुनाह है क्या..?
ये तो फेसबूक के द्वारा प्रदत एक सुविधा मात्र है...
टैग करने के भी कई कारण होते हैं ..जैसे ..
जो हम लिखते हैं ,सोचते हैं , महसूस करते हैं, उसे अपने सभी देखे ,अनदेखे, सुने ,अनसुने मित्रों से साझा करना चाहते हैं, जानना चाहते हैं की जो हम सोच रहे हैं , लिख रहे हैं , क्या वो आपको भी सही लगता है.. क्या आपको भी वो महसूस होता है जो मुझे महसूस होता है...और बस इसी जिज्ञासा , और मन में उमड़ते विचारों को आप सबसे साझा करती हूँ...
जानती हूँ कई मित्रों को पसंद नहीं की कोई उनके साथ अपने विचार साझा करे... ऐसे मैं उन्हें पूर्ण आजादी है के वो उस टैग को हटा दे, या उसे अनदेखा कर दें ..
मुझे नहीं पता बाकी लोग टैग क्यूँ करते हैं.. मेरे टैग करने की वजह ये है ... !!!
मैं टैग उन्हें करती हूँ जिन्हें मैं अपने से ज्यादा अनुभवी मानती हूँ , कह सकते हैं उनके कमेंट्स मेरे लिए लेखन के हौसले को बढाने का काम करते हैं.
ऐसा नहीं है की मैं टैग सिर्फ तारीफ पाने के लिए करती हूँ.. अगर किसी को मेरी लिखी कोई भी रचना या शायरी में कोई त्रुटी नज़र आये तो वो अपने विचार खुल कर लिख सकते हैं.. तभी तो मैं बेहतर लिखना सीख पायुंगी ना..
जब भी कुछ लिखती हूँ तो मन में एक बच्चे की तरह जिज्ञासा जागृत होती है की जो मैंने लिखा क्या वो सही है.. और बस झट से आप सभी को टैग कर देती हूँ..
आशा करती हूँ आप मेरे टैग को सराहेंगे और अपने विचार भी जरुर मुझसे साझा करेंगे...
मालूम है क्यूँ टैग करते हैं हम ..!!!!
मैंने कई मित्रों को अपने स्टेटस पर ये लिखने को मजबूर पाया की .. कृपया मुझे टैग ना करें अन्यथा टेग करने वाले को ब्लाक करना पड़ेगा...
अरे भाई क्यूँ..?
टैग करना कोई गुनाह है क्या..?
ये तो फेसबूक के द्वारा प्रदत एक सुविधा मात्र है...
टैग करने के भी कई कारण होते हैं ..जैसे ..
जो हम लिखते हैं ,सोचते हैं , महसूस करते हैं, उसे अपने सभी देखे ,अनदेखे, सुने ,अनसुने मित्रों से साझा करना चाहते हैं, जानना चाहते हैं की जो हम सोच रहे हैं , लिख रहे हैं , क्या वो आपको भी सही लगता है.. क्या आपको भी वो महसूस होता है जो मुझे महसूस होता है...और बस इसी जिज्ञासा , और मन में उमड़ते विचारों को आप सबसे साझा करती हूँ...
जानती हूँ कई मित्रों को पसंद नहीं की कोई उनके साथ अपने विचार साझा करे... ऐसे मैं उन्हें पूर्ण आजादी है के वो उस टैग को हटा दे, या उसे अनदेखा कर दें ..
मुझे नहीं पता बाकी लोग टैग क्यूँ करते हैं.. मेरे टैग करने की वजह ये है ... !!!
मैं टैग उन्हें करती हूँ जिन्हें मैं अपने से ज्यादा अनुभवी मानती हूँ , कह सकते हैं उनके कमेंट्स मेरे लिए लेखन के हौसले को बढाने का काम करते हैं.
ऐसा नहीं है की मैं टैग सिर्फ तारीफ पाने के लिए करती हूँ.. अगर किसी को मेरी लिखी कोई भी रचना या शायरी में कोई त्रुटी नज़र आये तो वो अपने विचार खुल कर लिख सकते हैं.. तभी तो मैं बेहतर लिखना सीख पायुंगी ना..
जब भी कुछ लिखती हूँ तो मन में एक बच्चे की तरह जिज्ञासा जागृत होती है की जो मैंने लिखा क्या वो सही है.. और बस झट से आप सभी को टैग कर देती हूँ..
आशा करती हूँ आप मेरे टैग को सराहेंगे और अपने विचार भी जरुर मुझसे साझा करेंगे...
टेग ...
टैग ..या ...साझा ..
मालूम है क्यूँ टैग करते हैं हम ..!!!!
मैंने कई मित्रों को अपने स्टेटस पर ये लिखने को मजबूर पाया की .. कृपया मुझे टैग ना करें अन्यथा टेग करने वाले को ब्लाक करना पड़ेगा...
अरे भाई क्यूँ..?
टैग करना कोई गुनाह है क्या..?
ये तो फेसबूक के द्वारा प्रदत एक सुविधा मात्र है...
टैग करने के भी कई कारण होते हैं ..जैसे ..
जो हम लिखते हैं ,सोचते हैं , महसूस करते हैं, उसे अपने सभी देखे ,अनदेखे, सुने ,अनसुने मित्रों से साझा करना चाहते हैं, जानना चाहते हैं की जो हम सोच रहे हैं , लिख रहे हैं , क्या वो आपको भी सही लगता है.. क्या आपको भी वो महसूस होता है जो मुझे महसूस होता है...और बस इसी जिज्ञासा , और मन में उमड़ते विचारों को आप सबसे साझा करती हूँ...
जानती हूँ कई मित्रों को पसंद नहीं की कोई उनके साथ अपने विचार साझा करे... ऐसे मैं उन्हें पूर्ण आजादी है के वो उस टैग को हटा दे, या उसे अनदेखा कर दें ..
मुझे नहीं पता बाकी लोग टैग क्यूँ करते हैं.. मेरे टैग करने की वजह ये है ... !!!
मैं टैग उन्हें करती हूँ जिन्हें मैं अपने से ज्यादा अनुभवी मानती हूँ , कह सकते हैं उनके कमेंट्स मेरे लिए लेखन के हौसले को बढाने का काम करते हैं.
ऐसा नहीं है की मैं टैग सिर्फ तारीफ पाने के लिए करती हूँ.. अगर किसी को मेरी लिखी कोई भी रचना या शायरी में कोई त्रुटी नज़र आये तो वो अपने विचार खुल कर लिख सकते हैं.. तभी तो मैं बेहतर लिखना सीख पायुंगी ना..
जब भी कुछ लिखती हूँ तो मन में एक बच्चे की तरह जिज्ञासा जागृत होती है की जो मैंने लिखा क्या वो सही है.. और बस झट से आप सभी को टैग कर देती हूँ..
आशा करती हूँ आप मेरे टैग को सराहेंगे और अपने विचार भी जरुर मुझसे साझा करेंगे...
अपने होने केअहसास ...
किसी की याद में
खामोश रह कर एसा लगता है
जैसे छू लिया हो आसमान
डूब गए हों समंदर की गहराईओं में
शबनम के कतरे को जैसे चख लिया हो
लगता है जैसे
जान लिया हो
अपने होने के अहसास को.
खामोश रह कर एसा लगता है
जैसे छू लिया हो आसमान
डूब गए हों समंदर की गहराईओं में
शबनम के कतरे को जैसे चख लिया हो
लगता है जैसे
जान लिया हो
अपने होने के अहसास को.
Thursday, October 3, 2013
सत्य घटना ...
१८
जुलाई २०१३ की रात , समय ,रात के १०.१५ ,…. बेटा ,… मम्मी गेट की चाबी कहाँ
हैं ? माँ ,.. इतनी रात को कहाँ जाना है ,\? बेटा,.... मुझे दोस्त के यहाँ
जाना है , माँ,.. इतनी रात को कहीं नहीं जाना चुपचाप सो जाओ , सुबह चले
जाना। बेटा,… प्लीस चाबी दो ना , मैं जल्दी लौट आयूंगा। मगर माँ चाबी नहीं
देती , और चाबी अपने तकिये के नीचे रख सो जाती है शायद किसी अनहोनी की
आशंका हो रही थी माँ को, और बेटा इंतज़ार में था
की माँ कब सोये और कब मैं चला जायुं , और कुछ देर बाद माँ की आँख लग गयी ,
और बेटा चाबी ढूंढते हुए माँ के तकिये तक आ पहुंचा और उसे वहां चाबी मिल
गई , उसने चुपके से चाबी निकली और पीछे वाला गेट खोल कर चुपके से बाइक खींच
कर कॉलोनी के गेट तक ले गया और बाइक स्टार्ट करके निकल गया दोस्त से
मिलने। … अचानक रात ११.३० पर माँ की आँख खुली , जाने क्यूँ उसे लगा की बेटा
शायद चाबी लेकर चला गया है उसने देखा चाबी नहीं थी , माँ को चिंता हुई
उसने सो रहे अपने पति को उठाया और कहा सुनो नमित घर पर नहीं है। . और अभी
तक घर भी नहीं आया , आप उसे फोन करो ,पिता ने फोन किया फोन पर बेटे की जगह
किसी और की आवाज़ सुनाई दी , वो कह रहा था हम काफी देर से फोन करने की कोशिश
कर रहे हैं ,मगर हमे ये नए ज़माने का फोन समझ ही नहीं आ रहा था, पिता ने
घबराते हुए पूछा आप कौन ? सामने से आवाज़ आई मैं पुलिस स्टेशन से बोल रहा
हूँ , आपके बेटे का एक्सीडेंट हो गया है , आप हॉस्पिटल पहुँचिये , पिता ये
सुनकर जैसे सुन्न हो गए , कुछ बात पूछते नहीं बन रही थी, दिल था की हलक तक आ
गया था , बुरे बुरे ख्याल आने लगे , थोड़ी हिम्मत जुटा कर पिता ने पूछा
,मेरा बेटा ठीक तो है ना…। पुलिस वाला बोला आपके बेटे की ओन डा स्पॉट डेथ
हो गई है , आकर एक बार कन्फर्म कर लीजिये की वो आपका ही बेटा है या हो सकता
है कोई और उसकी बाइक ले गया हो. माँ बहुत घबरायी हुए सी बोली क्या हुआ ,
बताओ ना , पिता ने हिम्मत करके कहा कुछ नहीं नमित का एक्सीडेंट हो गया है
और वो अभी आई सी यू में है , सुबह मिलने देंगे , अभी तुम सो जाओ , और ऐसा
कहकर पिता ने अपने बड़े बेटे को जगाया और सब बात बताई और कहा तुम जाओ और देख
कर आयो की जो पुलिस वाला कह रहा है वो सच है या किसी ने भद्दा मज़ाक किया
है, रात १२.३० पर बड़े बेटे का फोने आया वो रो रहा था , और रोते हुए उसने
कहा पापा पुलिस वाले ने सच कहा ,नमित अब नहीं है , मैं उ सके पास ही
हूँ,पुलिस वाले कह रहे हैं बॉडी पोस्ट मार्टम के बाद ही मिलेगी। पिता ने
हिम्मत जुटा कर कहा बेटा घर आ जाओ ,और घर आकर अभी अपनी माँ को कुछ मत
बताना। और बेटा घर लौट आया उस रात की रात बहुत लम्बी थी , और बेटे की डेड
बॉडी लाने के लिए सुबह जब पिता और बेटा वहां पहुंचे तो डॉक्टर ने कहा ,
आपके बेटे की आँखों में अभी रौशनी है, क्या आप अपने बेटे की आँखें दान करना
चाहेंगे ? और उस वक़्त एक पिता ना बनकर एक सच्चा इंसान बनकर पिता ने मुड़कर
अपने बड़े बेटे की और देखा। ज़ैसे पूछ रहे हों की क्या तुम्हे कोई ऐतराज़ तो
नहीं, और बेटे ने स्वीकृति में गर्दन हिला दी. और पिता ने मुड़कर डॉक्टर से
कहा मेरे बेटे के जो भी अंग किसी की जिंदगी बचाने के काम आ सकते हों वो सब
मैं दान करने को तयार हूँ , और ऐसा कहकर पिता रो पड़े और हाथ जोड़कर डॉक्टर
के सामने खड़े हो गए। डॉक्टर की आँखें छलक पड़ी , और डॉक्टर ने हाथ जोड़कर कहा
धन्य है ऐसा पिता जो ऐसी परिस्थिथि में भी अपने बेटे के अंग दान कर दूसरों
की जिंदगी बचाने के लिए हिम्मत रखता है , धन्य हुआ वो बेटा जिसका ऐसा पिता
है , और ऐसा कहकर डॉक्टर ने उन्हें गले से लगा लिया , और कहा काश समाज में
ऐसे पिता होते तो आज कितनी जिंदगियां बचाई जा सकती थीं..
यह एक सत्य घटना है।
यह एक सत्य घटना है।
Wednesday, March 20, 2013
वही नजदिकिया ,
वही नजदीकियां ,
वही फांसले भी थे ,
रहे क़दमों के निशाँ मिटते मगर ,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया...
वही रस्मे...
वही रवायतें भी निभती रहीं ,
भीड़ में रहे दोनों मगर,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया...
कभी शर्म -ओ- हया ,
कभी तपिश-ए-बदन,
रहे जलते -बुझते दोनों मगर ,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया...
वही झुकी पलकें मेरी रहीं ,
वही ख्वाब मेरा तेरे तकिये तले,
रहे जागते दोनों मगर ,इज़हार न तूने किया न मैंने किया,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया...
ज़माने की खातिर मैं हो गयी बे-वफ़ा,
बिन मिले बिछड़े दोनों मगर,
ना अपने हिस्से का प्यार मैंने किया न तूने किया,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया.....[नीलम] —
वही फांसले भी थे ,
रहे क़दमों के निशाँ मिटते मगर ,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया...
वही रस्मे...
वही रवायतें भी निभती रहीं ,
भीड़ में रहे दोनों मगर,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया...
कभी शर्म -ओ- हया ,
कभी तपिश-ए-बदन,
रहे जलते -बुझते दोनों मगर ,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया...
वही झुकी पलकें मेरी रहीं ,
वही ख्वाब मेरा तेरे तकिये तले,
रहे जागते दोनों मगर ,इज़हार न तूने किया न मैंने किया,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया...
ज़माने की खातिर मैं हो गयी बे-वफ़ा,
बिन मिले बिछड़े दोनों मगर,
ना अपने हिस्से का प्यार मैंने किया न तूने किया,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया.....[नीलम] —
Wednesday, March 13, 2013
ये मेरी साँसे बस तुम्हारे लिये...
ये राते ..
ये मेरी साँसे बस तुम्हारे लिए..
तुम दूर हो तो क्या ..
ये सारी बातें बस तुम्हारे लिए..
गाती हूँ ग़ज़ल ,
लेकिन गुनगुनायुंगी ये गीत बस तुम्हारे लिए..
मेरी आँखों का सुहाना ख्वाब है तू,
लेकिन आँखों मे कटेगी हर रात बस तुम्हारे लिए,...
ये रिश्ते ये नाते है सबके लिए ,
लेकिन ये अहसास का सम्बंध तुम्हारे लिए ....
ये जिस्म है सिर्फ उसका ,
लेकिन इसमें बसी जान बस तुम्हारे लिए,...
पतझड़ का फूल हूँ मैं,
लेकिन बसंत की बहार हूँ बस तुम्हारे लिए..
धधकती लो हूँ शमा की मगर ,
पिघलता मोम हूँ बस तुम्हारे लिए...
मेरी मुस्कुराहटो पर ना जायो ,
इनमे छिपा हर अश्क बस तुम्हारे लिए..
बेवफा हूँ तो क्या हुआ,
ये वादा खिलाफी की मैंने बस तुम्हारे लिए...
ये राते ..
ये मेरी सांसे बस तुम्हारे लिए,...
तुम दूर हो तो क्या..
ये सारी बातें बस तुम्हारे लिए...[नीलम]
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