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Friday, May 2, 2014

"आखिरी झूठ".... ,


झूठ........
हाँ झूठ .
फिर से बोला एक और झूठ
आज मैं ने
"ख़ुद" से खुद ही,
खुद को समझाने की खातिर !

नहीं हारी मैं अब तक,
परिस्तिथियाँ कैसी भी हों
कैसा भी हो मौसम का मिज़ाज ,

बहुत "मज़बूत" हूँ मैं ,
एक और झूठ बोला मैं ने खुद से ------!

आहा !!!
कमाल हो गया ....
हो गया नई ऊर्जा का संचार
निखर - निखर संवर-संवर सी गई " मैं "
एक नया हौसला एक नई उमंग,
शुरू हो गयी फिर से एक नई जंग,
खुद से खुद को जुदा करने के लिए।

हार - जीत..
जीत - हार...
ज़िंदगी को देनी है नई रफ़्तार...

मगर खुद का" विश्वास" बढ़ाने के लिए ,
बस एक "आखिरी" झूठ ,
सबसे बड़ा झूठ ,

"उम्मीद " …

इसके बाद .....
किसी और "झूठ "की कोई जरुरत नहीं ,
इसी के सहारे तो बीत जाती है ,
सारी जिंदगी ……!!!
_[नीलम]_

Wednesday, April 16, 2014

आवाज़ें......

आवाज़ें ……

आवाज़ें मर जाती है 
मगर ...

ज़िंदा रहती हैं खामोशियाँ 
और खामोशियाँ
अक्सर शोर करती हैं 
गूंजती हैं
सन्नाटों में 
कभी महसूस करना तुम 
तब 
जब
तुम्हारे चारों ओर पसरा हुआ हो
ढेर सारा सन्नाटा
और हाँ...
तुम्हारे घर की दीवारों पर टंगी हुई हों 
सिर्फ मेरी यादें .

_[नीलम]_

नींद ......

जाने क्यूँ मेरी रातें सुलग जाती हैं ,
ना तुम आते हो ,ना नींद ही  आती है। [नीलम]

Friday, February 21, 2014

विदा . . .




जो अपने थे मगर अपने नहीं थे, फिर भी अपनों से बढ़कर थे,
उनके चले जाने की कमी बेहद्द तक़लीफ़ देती हैं, क्यूंकि कई बार हम अपनों से भी वो सब साझा नहीं कर पाते जो करना चाहते हैं, और तब यही अपने जो अपने नहीं होते, फिर भी अपनों से बढ़कर लगते हैं,
क्यूंकि हम उन्हें कह पाते हैं अपने मन की हर ख़ुशी, हर दर्द ,
और जब यही अपने दूर बहुत दूर चले जाते हैं ,तब जो रिक्तता आती है जीवन में उसे कोई दूसरा भर नहीं पाता , तब बेहद्द अकेलापन महसूस होता है , और तब शब्दकोष का सबसे रुआंसा शब्द बन जाता है विदा......


मुश्किल होता है कह पाना ...
विदा....
जो शब्दकोष का सबसे ruy शब्द  है ,
विदा शब्द ज़ेहन में आते ही तड़पने लगता है मन ,
विदा लेते ही छलकने लगती हैं आँखें ,
जाने क्यूँ ,
विदा ले लेने के बाद भी ,
शेष रह जाता है सब कुछ ,
जो किसी के चले जाने के बाद भी ,
गया हुआ नहीं लगता ,
लगता है तो बस इतना ,
जैसे रिक्त हो गया हो कोई स्थान ,
मगर रिक्त नहीं होती यादें,
और विदा होने के बाद भी रह जाते हैं शेष...
आंसूं ,यादें ,और स्पष्ट होते हुए चेहरे !!!! [नीलम]

(शब्दकोष का सबसे रुआंसा शब्द है विदा.....) ये लाईनें मैंने दीपक अरोरा जी की रचना में पढ़ीं थीं , उन्ही से प्रेरित होकर कुछ लिखने की कोशिश की है , या यूँ कहिये अपनों से विदा होने का दंश जो मैं भी झेल रही हूँ उसे शब्द देने कि कोशिश की है ……..

Thursday, February 13, 2014

इजहार नहीं करता . . .








ये बात और है , मैं इज़हार नहीं करता ,
लेकिन ये भी झूठ है ,के मैं तुझे प्यार नहीं करता।।[नीलम]

                                           

Wednesday, February 12, 2014

टैग ...

टैग ..या ...साझा ..
मालूम है क्यूँ टैग करते हैं हम ..!!!!
मैंने कई मित्रों को अपने स्टेटस पर ये लिखने को मजबूर पाया की .. कृपया मुझे टैग ना करें अन्यथा टेग करने वाले को ब्लाक करना पड़ेगा...
अरे भाई क्यूँ..?
टैग करना कोई गुनाह है क्या..?
ये तो फेसबूक के द्वारा प्रदत एक सुविधा मात्र है...
टैग करने के भी कई कारण होते हैं ..जैसे ..
जो हम लिखते हैं ,सोचते हैं , महसूस करते हैं, उसे अपने सभी देखे ,अनदेखे, सुने ,अनसुने मित्रों से साझा करना चाहते हैं, जानना चाहते हैं की जो हम सोच रहे हैं , लिख रहे हैं , क्या वो आपको भी सही लगता है.. क्या आपको भी वो महसूस होता है जो मुझे महसूस होता है...और बस इसी जिज्ञासा , और मन में उमड़ते विचारों को आप सबसे साझा करती हूँ...
जानती हूँ कई मित्रों को पसंद नहीं की कोई उनके साथ अपने विचार साझा करे... ऐसे मैं उन्हें पूर्ण आजादी है के वो उस टैग को हटा दे, या उसे अनदेखा कर दें ..
मुझे नहीं पता बाकी लोग टैग क्यूँ करते हैं.. मेरे टैग करने की वजह ये है ... !!!
मैं टैग उन्हें करती हूँ जिन्हें मैं अपने से ज्यादा अनुभवी मानती हूँ , कह सकते हैं उनके कमेंट्स मेरे लिए लेखन के हौसले को बढाने का काम करते हैं.
ऐसा नहीं है की मैं टैग सिर्फ तारीफ पाने के लिए करती हूँ.. अगर किसी को मेरी लिखी कोई भी रचना या शायरी में कोई त्रुटी नज़र आये तो वो अपने विचार खुल कर लिख सकते हैं.. तभी तो मैं बेहतर लिखना सीख पायुंगी ना..
जब भी कुछ लिखती हूँ तो मन में एक बच्चे की तरह जिज्ञासा जागृत होती है की जो मैंने लिखा क्या वो सही है.. और बस झट से आप सभी को टैग कर देती हूँ..
आशा करती हूँ आप मेरे टैग को सराहेंगे और अपने विचार भी जरुर मुझसे साझा करेंगे...

टेग ...


टैग ..या ...साझा ..
मालूम है क्यूँ टैग करते हैं हम ..!!!!
मैंने कई मित्रों को अपने स्टेटस पर ये लिखने को मजबूर पाया की .. कृपया मुझे टैग ना करें अन्यथा टेग करने वाले को ब्लाक करना पड़ेगा...
अरे भाई क्यूँ..?
टैग करना कोई गुनाह है क्या..?
ये तो फेसबूक के द्वारा प्रदत एक सुविधा मात्र है...
टैग करने के भी कई कारण होते हैं ..जैसे ..
जो हम लिखते हैं ,सोचते हैं , महसूस करते हैं, उसे अपने सभी देखे ,अनदेखे, सुने ,अनसुने मित्रों से साझा करना चाहते हैं, जानना चाहते हैं की जो हम सोच रहे हैं , लिख रहे हैं , क्या वो आपको भी सही लगता है.. क्या आपको भी वो महसूस होता है जो मुझे महसूस होता है...और बस इसी जिज्ञासा , और मन में उमड़ते विचारों को आप सबसे साझा करती हूँ...
जानती हूँ कई मित्रों को पसंद नहीं की कोई उनके साथ अपने विचार साझा करे... ऐसे मैं उन्हें पूर्ण आजादी है के वो उस टैग को हटा दे, या उसे अनदेखा कर दें ..
मुझे नहीं पता बाकी लोग टैग क्यूँ करते हैं.. मेरे टैग करने की वजह ये है ... !!!
मैं टैग उन्हें करती हूँ जिन्हें मैं अपने से ज्यादा अनुभवी मानती हूँ , कह सकते हैं उनके कमेंट्स मेरे लिए लेखन के हौसले को बढाने का काम करते हैं.
ऐसा नहीं है की मैं टैग सिर्फ तारीफ पाने के लिए करती हूँ.. अगर किसी को मेरी लिखी कोई भी रचना या शायरी में कोई त्रुटी नज़र आये तो वो अपने विचार खुल कर लिख सकते हैं.. तभी तो मैं बेहतर लिखना सीख पायुंगी ना..
जब भी कुछ लिखती हूँ तो मन में एक बच्चे की तरह जिज्ञासा जागृत होती है की जो मैंने लिखा क्या वो सही है.. और बस झट से आप सभी को टैग कर देती हूँ..
आशा करती हूँ आप मेरे टैग को सराहेंगे और अपने विचार भी जरुर मुझसे साझा करेंगे...

अपने होने केअहसास ...

किसी की याद में 
खामोश रह कर एसा लगता है
जैसे छू लिया हो आसमान 
डूब गए हों समंदर की गहराईओं में
शबनम के कतरे को जैसे चख लिया हो
लगता है जैसे
जान लिया हो 
अपने होने के अहसास को.

--[नीलम]--

Thursday, October 3, 2013

इश्क की मजबूरियां...

ये तेरे इश्क की कैसी हैं मजबूरियां ....
जिसने बढा दी तेरे मेरे दरमियाँ दूरियां ...[नीलम]


          

सत्य घटना ...

१८ जुलाई २०१३ की रात , समय ,रात के १०.१५ ,…. बेटा ,… मम्मी गेट की चाबी कहाँ हैं ? माँ ,.. इतनी रात को कहाँ जाना है ,\? बेटा,.... मुझे दोस्त के यहाँ जाना है , माँ,.. इतनी रात को कहीं नहीं जाना चुपचाप सो जाओ , सुबह चले जाना। बेटा,… प्लीस चाबी दो ना , मैं जल्दी लौट आयूंगा। मगर माँ चाबी नहीं देती , और चाबी अपने तकिये के नीचे रख सो जाती है शायद किसी अनहोनी की आशंका हो रही थी माँ को, और बेटा इंतज़ार में था की माँ कब सोये और कब मैं चला जायुं , और कुछ देर बाद माँ की आँख लग गयी , और बेटा चाबी ढूंढते हुए माँ के तकिये तक आ पहुंचा और उसे वहां चाबी मिल गई , उसने चुपके से चाबी निकली और पीछे वाला गेट खोल कर चुपके से बाइक खींच कर कॉलोनी के गेट तक ले गया और बाइक स्टार्ट करके निकल गया दोस्त से मिलने। … अचानक रात ११.३० पर माँ की आँख खुली , जाने क्यूँ उसे लगा की बेटा शायद चाबी लेकर चला गया है उसने देखा चाबी नहीं थी , माँ को चिंता हुई उसने सो रहे अपने पति को उठाया और कहा सुनो नमित घर पर नहीं है। . और अभी तक घर भी नहीं आया , आप उसे फोन करो ,पिता ने फोन किया फोन पर बेटे की जगह किसी और की आवाज़ सुनाई दी , वो कह रहा था हम काफी देर से फोन करने की कोशिश कर रहे हैं ,मगर हमे ये नए ज़माने का फोन समझ ही नहीं आ रहा था, पिता ने घबराते हुए पूछा आप कौन ? सामने से आवाज़ आई मैं पुलिस स्टेशन से बोल रहा हूँ , आपके बेटे का एक्सीडेंट हो गया है , आप हॉस्पिटल पहुँचिये , पिता ये सुनकर जैसे सुन्न हो गए , कुछ बात पूछते नहीं बन रही थी, दिल था की हलक तक आ गया था , बुरे बुरे ख्याल आने लगे , थोड़ी हिम्मत जुटा कर पिता ने पूछा ,मेरा बेटा ठीक तो है ना…। पुलिस वाला बोला आपके बेटे की ओन डा स्पॉट डेथ हो गई है , आकर एक बार कन्फर्म कर लीजिये की वो आपका ही बेटा है या हो सकता है कोई और उसकी बाइक ले गया हो. माँ बहुत घबरायी हुए सी बोली क्या हुआ , बताओ ना , पिता ने हिम्मत करके कहा कुछ नहीं नमित का एक्सीडेंट हो गया है और वो अभी आई सी यू में है , सुबह मिलने देंगे , अभी तुम सो जाओ , और ऐसा कहकर पिता ने अपने बड़े बेटे को जगाया और सब बात बताई और कहा तुम जाओ और देख कर आयो की जो पुलिस वाला कह रहा है वो सच है या किसी ने भद्दा मज़ाक किया है, रात १२.३० पर बड़े बेटे का फोने आया वो रो रहा था , और रोते हुए उसने कहा पापा पुलिस वाले ने सच कहा ,नमित अब नहीं है , मैं उ सके पास ही हूँ,पुलिस वाले कह रहे हैं बॉडी पोस्ट मार्टम के बाद ही मिलेगी। पिता ने हिम्मत जुटा कर कहा बेटा घर आ जाओ ,और घर आकर अभी अपनी माँ को कुछ मत बताना। और बेटा घर लौट आया उस रात की रात बहुत लम्बी थी , और बेटे की डेड बॉडी लाने के लिए सुबह जब पिता और बेटा वहां पहुंचे तो डॉक्टर ने कहा , आपके बेटे की आँखों में अभी रौशनी है, क्या आप अपने बेटे की आँखें दान करना चाहेंगे ? और उस वक़्त एक पिता ना बनकर एक सच्चा इंसान बनकर पिता ने मुड़कर अपने बड़े बेटे की और देखा। ज़ैसे पूछ रहे हों की क्या तुम्हे कोई ऐतराज़ तो नहीं, और बेटे ने स्वीकृति में गर्दन हिला दी. और पिता ने मुड़कर डॉक्टर से कहा मेरे बेटे के जो भी अंग किसी की जिंदगी बचाने के काम आ सकते हों वो सब मैं दान करने को तयार हूँ , और ऐसा कहकर पिता रो पड़े और हाथ जोड़कर डॉक्टर के सामने खड़े हो गए। डॉक्टर की आँखें छलक पड़ी , और डॉक्टर ने हाथ जोड़कर कहा धन्य है ऐसा पिता जो ऐसी परिस्थिथि में भी अपने बेटे के अंग दान कर दूसरों की जिंदगी बचाने के लिए हिम्मत रखता है , धन्य हुआ वो बेटा जिसका ऐसा पिता है , और ऐसा कहकर डॉक्टर ने उन्हें गले से लगा लिया , और कहा काश समाज में ऐसे पिता होते तो आज कितनी जिंदगियां बचाई जा सकती थीं..
यह एक सत्य घटना है।

Wednesday, March 20, 2013

वही नजदिकिया ,





वही नजदीकियां ,
वही फांसले भी थे ,
रहे क़दमों के निशाँ मिटते मगर ,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया...

वही रस्मे...
वही रवायतें भी निभती रहीं ,
भीड़ में रहे दोनों मगर,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया...

कभी शर्म -ओ- हया ,
कभी तपिश-ए-बदन,
रहे जलते -बुझते दोनों मगर ,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया...

वही झुकी पलकें मेरी रहीं ,
वही ख्वाब मेरा तेरे तकिये तले,
रहे जागते दोनों मगर ,इज़हार न तूने किया न मैंने किया,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया...

ज़माने की खातिर मैं हो गयी बे-वफ़ा,
बिन मिले बिछड़े दोनों मगर,
ना अपने हिस्से का प्यार मैंने किया न तूने किया,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया.....[नीलम]
 — 

Wednesday, March 13, 2013

ये मेरी साँसे बस तुम्हारे लिये...



ये राते ..
ये मेरी साँसे बस तुम्हारे लिए..

तुम दूर हो तो क्या ..
ये सारी बातें बस  तुम्हारे लिए..

गाती हूँ ग़ज़ल ,
लेकिन गुनगुनायुंगी ये गीत बस तुम्हारे लिए..

मेरी आँखों का सुहाना ख्वाब है तू,
लेकिन आँखों मे कटेगी हर रात बस तुम्हारे लिए,...

ये रिश्ते ये नाते है सबके लिए ,
लेकिन ये अहसास का  सम्बंध तुम्हारे लिए ....

ये जिस्म है सिर्फ उसका ,
लेकिन इसमें बसी जान बस तुम्हारे लिए,...

पतझड़ का फूल हूँ मैं,
लेकिन बसंत की बहार हूँ बस तुम्हारे लिए..

धधकती लो हूँ शमा की मगर ,
पिघलता मोम हूँ बस तुम्हारे लिए...

मेरी मुस्कुराहटो पर ना जायो ,
इनमे छिपा हर अश्क बस तुम्हारे लिए..

बेवफा हूँ तो क्या हुआ,
ये वादा खिलाफी की मैंने बस तुम्हारे लिए...

ये राते ..
ये मेरी सांसे बस तुम्हारे लिए,...

तुम दूर हो तो क्या..
ये सारी बातें बस तुम्हारे लिए...[नीलम]

Saturday, March 9, 2013

मर्द कभी नहीं रोते . . .

**** मर्द कभी नहीं रोते*****
   

मैं बचपन से सुनता आ रहा हूँ,
मर्द कभी नहीं रोते,
और मैं भी कभी नहीं रोया,
मर्द हूँ ना..
जब बहिन के पति का स्वर्गवास हुआ,
तब भी नहीं रोया था मैं,
जबकि जानता था मेरी बहिन का संसार लुट चूका है,
मगर बहिन और भांजे ,भांजियो की जिम्मेदारी जो उठानी थी,
अगर रोता तो कमजोर पड जाता ना मैं,
इसलिए नहीं रोया तब भी,
क्यूंकि जानता था ...
मर्द कभी नहीं रोते,
बेटी का उजड़ा घर देख पिता भी २ साल बाद चल बसे,
तब भी नहीं रोया था मैं,
माँ और छोटे बहिन ,भाई को भी तो संभालना था ना मुझे,
और जानता था,
मर्द कभी नहीं रोते,
इसलिए नहीं रोया था तब भी,
अभी पिता के शोक से उभर नहीं पाया था कि माँ भी चल बसी,
अब हिम्मत टूटने लगी थी ,
लेकिन नहीं रोया था तब भी मैं,
क्यूंकि बहनों, छोटे भाई और उनके बच्चों को जो संभालना था ,
उन्हें दिलासा जो देना था,
कि मैं हूँ ,तुम सबके साथ,
तुम्हारे सर पर रहेगा हमेशा मेरा हाथ ,
तुम्हारे हर सुख दुःख में हूँ मैं तुम्हारे साथ,
और जानता भी था ना...
कि मर्द कभी नहीं रोते,
इसलिए नहीं रोया था तब भी मैं,
बहुत कोशिश की ,
कि नहीं रोना है मुझे,
लेकिन अब मैं भी कमजोर पड़ने लगा था,
छुप छुप के अंधेरों में रोने लगा था,
लेकिन एक दिन अचानक सुबह दफ्तर में किसी का फोन आया,
मेरा दिल तब बहुत जोर से घबराया,
मैंने हिम्मत जुटा कर फोन उठाया ,
वहां से कोई बोला आपके छोटे भाई कि तबियत बहुत बिगड़ गई है,
और वो बार बार बस यही कह रहे हैं,
कि मेरे भाई को बुला दो,
उन्हें बोलो जल्दी से आके मुझे अपने सीने में छुपा ले,
और मैंने झट से फोन पटक दिया,
और बेतहाशा दफ्तर से निकल पड़ा,
जब तक मैं अस्पताल पहुंचा ,
मेरा भाई मुझे छोड़ के चल दिया था,
और मैं ...
बुत बना बस देख रहा था,
बहुत बार याद की बचपन की बात,
कि मर्द कभी नहीं रोते ,
मगर सबके जाने का दुःख अब मुझे तोड़ रहा था ,
हर कोई मुझे अकेला छोड़ कर चले जा रहा था,
और मैं खुद को बस समझा रहा था,
कि मर्द कभी नहीं रोते..
भाई कि पत्नी और उसके नन्हे से बच्चों कि जिम्मेदारी भी अब मुझ पर आन पड़ी है,
उनको भी अब अब संभालना होगा,
और ये दुःख मेरी बहनों से भी झेला ना जायेगा,
लेकिन अब तक जो समन्दर आँखों में बाँध रखा था,
क्यूंकि बचपन से ये मान रखा था ,
कि मर्द कभी नहीं रोते,
अब मैं ये भूल चुका था,
आंसुओं का झरना फूट पड़ा था.
जब भी छोटे भाई के आखिरी शब्द याद आते हैं,
मेरे भाई को बुला दो बस....
तब तब मैं हमेशा भूल जाता हूँ,
कि ..
मर्द कभी नहीं रोते.....
मर्द जब टूट जाता है,
उसका हर अपना जब छूट जाता है,
तब मर्द भी रोते हैं..[नीलम]
 — 

Saturday, November 19, 2011

ख़लल ...





     जाने क्यूँ ख़लल डाल जाती हैं उसकी यादें मेरी ज़िन्दगी में ,
     मैंने तो उसे यूँ कभी ख़्वाबों में भी परेशां किया ना था !!
.[नीलम ] 

Sunday, July 24, 2011

~:कुछ शेर और मुक्तक:~




















कुछ शेर और मुक्तक अर्ज़ कर रही हूँ .आशा करती हूँ जिस तरह आपने मेरे कविताओं को सराहा है और मेरा हौसला बढाया है उसी तरह आप मेरे शेरो शायरी को भी सराहेंगे और मेरा मार्ग दर्शन करेंगे.. अगर कोई गुस्ताखी हो जाए तो मुझे क्षमा कर दीजियेगा ...



१)... आँखों के अश्क बह नहीं पाए, ,

खामोश रहे किसी से कुछ कह नहीं पाए,

किस से कहते दास्ताँ अपने दिल की,

जो था अपना उसे अपना कह नहीं पाए.

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२).जब भी रातों मे तेरी याद आती है ,

वीरान रातों में चाँदनी उतर आती है,

सोचती हूँ तुम मिलोगे खवाबों मे,

मगर ना तुम आते हो ना नींद आती है.

>>>>>>>>>>><<<<<<<<<<<<<<<&


३)मेरी तनहाइयाँ भी अब गुनगुनाने लगी हैं,

हाथों की चूडियाँ कुछ बताने लगी हैं,

ये खनक है शायद उनके आने की,

जिनकी याद में तू अब मुस्कुराने लागी है.



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4).अपने अश्कों को छलकाना चाहती हूँ,

तुझे अपने सीने से लगाना चाहती हूँ,

जहाँ मिलती है ज़मी आसमा से ,

वहां अपना आशियाना बनाना चाहती हूँ.


>>>>>>>>>>>>>>><<<<<<<<<<&

5)रात ढलती गयी ,

दिन भी गुज़रता गया,

उस से मिलने की उम्मीद का,

ये पल भी फिसलता गया.


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चंद शेर अर्ज़ हैं......

१). ना जाने वो कौन लोग थे जिनके ज़ख्म वक़्त भर गया,

हमे तो हर सुबह इक नया ज़ख्म दे जाती है ज़िन्दगी.

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२). खफ़ा भी नहीं हूँ और इस गम से जुदा भी नहीं हूँ,

वजूद तो मेरा भी है यहाँ वहां फिजाओं मे, सिमटी हूँ अभी बिखरी नहीं हूँ


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३). देखिये मेरे इंतज़ार की हद्द है कहाँ तक,

मरने के बाद भी मेरी आँखे खुली रखना.

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४).यूँ ही मुस्कुराती और गुनगुनाती हूँ मैं,

कितना है दर्द दिल मैं खुद से भी छुपाती हूँ मैं.

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5).आन्धिओं मे कहाँ दम था गिरा जाती वो मुझे शाख से,

उसकी हसरत - ए -बहार की खातिर खुद टूट कर गिरा हूँ मैं.


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6).यूँ तो फुर्सत ही फुर्सत है ज़िन्दगी मे,लेकिन

इन दिनों खुद को जिंदा रखने मे बहुत मसरूफ हूँ मैं.


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Wednesday, May 18, 2011

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात.....







likh dala hai naam tumhara panno par, 
ro padi to mit jaayegi meri jhooti aas ,

jao mujhe nahi karni aab tumse koi baat.

chhoo jaate ho kyun ahsaas bankar,
kisi din jal kar ban jayungi main rakh.


jao mujhe nahi karni tumse koi baat

katra katra yunhi bikharti rahi agar mai....!
to rah jaayungi ek din main ban kewal laash 


jao mujhe nahi karni tumse koi baat,


milte nahi ho khaayaaalon main bhi theek se,
de jaate ho adhi adhuri pyaaas,


jao mujhe nahi karni tumse koi baat.

kitna sataate ho aa ake khawabon main,
kyun de jaate ho ek tooti hue si आस,



jao mujhe nahi karni tumse koi baat.

kyun jalate ho umeedon ke diye, 
lag jati meri sukhi choukhat par aag.

jao mujhe nahi karni tumse koi baat.
>>>>>>>>>><<<<<<<


लिख डाला है नाम तुम्हारा पन्नो पर ,
रो पड़ी तो मिट जायेगी मेरी झूठी आस,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात,

छू जाते हो क्यूँ अहसास बनकर ,
किसी दिन जलकर बन जयुंगी मैं राख ,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात,

कतरा कतरा यूँही बिखरती रही अगर मैं,
तो रह जयुंगी इक दिन मैं बन केवल लाश ,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात,

मिलते नहीं हो खयालो में भी ठीक से,
दे जाते हो आधी अधूरी प्यास,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात,

कितना सताते हो आ आ के ख्वाबो में,
क्यूँ दे जाते हो टूटी  हुई सी इक आस,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात,

क्यूँ जलाते हो उमीदो के दिए ,
लग जाती हाई मेरी सुखी चौखट पर आग,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात.

[नीलम]

Tuesday, May 3, 2011

चुप हो जा मुझसे मत कहना...




चलते चलते थक गयी हूँ,
कब तू छोड़ गया मेरा साथ ,किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

इक उम्मीद तेरे आने की, 
मैं उसमे जलायुं अपने दिन और रात,किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

इक दर्द उठा तेरे सीने में,
मेरे दिल के भी है दर्द हज़ार ,किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

छलक जाते हैं तेरी आँखों के भी आंसूं ,
मेरी पलकों की बिन बदली बरसात , किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

इक करवट उधर तू बदले,
इधर मैं बदलू करवट बार बार, किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

इक तनहा चाँद तेरे अंगान का,
मेरे भी आँगन मैं टूटे तारे हज़ार ,किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

कब दामन छुटा, कब आस टूटी ,किसी से मत कहना,
ये राज की है बात,ये राज़ किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

मैं यूँही बैठी रही तेरी दहलीज़ पर ,
कब ,किस दिन टूटी नीलम की आस, किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,
[नीलम]

Friday, February 18, 2011

लफ्ज़




आज वो फिर आई थी,


कुछ बिखरे ,कुछ उलझे हुए लफ्ज़ लेकर ,

और जाते हुए मुझसे कह गयी,

अपने बिखरे हुए लफ्ज़ समेटने को,

और साथ ही सवाल भी कर गयी...

क्या समेट पायोगे मेरे बिखरे,उलझे लफ्ज़...

शायद उसे अहसास ही नहीं,

के में खुद कितना बिखरा हुआ हूँ,

लेकिन ,फिर भी हर बार की तरह,

इस बार भी कोशिश कर रहा हूँ,

उसके बिखरे,उलझे लफ़्ज़ों को समेटने की,

जिन्हें वो गीत की तरह गाना चाहती है,

ग़ज़ल की तरह गुनगुनाना चाहती है,

उसका एक एक लफ्ज़ मेरी नसों में बह रहा है लहू बन कर,

उसके बिखरे लफ़्ज़ों को लिखता हूँ उसके लिए,

जी तो बहुत चाहता है....

के वो भी कभी मेरे बिखरे लफ़्ज़ों को समेटे,

मगर ,कह नहीं पता,

क्युंकी में उसे टूटते हुए नहीं देखना चाहता,

नहीं चाहता की वो भी बिखर जाए मेरी तरह,

इसलिए हर बार की तरह,

खुद को उसके लफ़्ज़ों में समेट उसकी नज़र कर देता हूँ,

जिन्हें पढ़ कर वो अपनी बेजान मुस्कुराहटों को सेंक लेती है,

कुछ पल के लिए,

और उस वक़्त उसके खामोश से लब,

कुछ समेटे हुए लफ्ज़ मेरे लिए कह जाते हैं,

और फिर से वादा कर जाती है जाते हुए...

फिर से बिखरे हुए लफ्ज़ दे जाने का,

और कह जाती है...

कल तुम मेरे लफ्ज़ नहीं,

मुझे समेट लेना,

खुद में,

ताकि में फिर कभी मै बिखरे लफ्ज़ लेकर ना आयूँ,

क्युंकी मैं जान गयी हूँ,

तुम अब मुझको खुद में समेट चुके हो.
 

Friday, February 4, 2011

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो.



जब मैं रूठ जाती हूँ ,


और तब तुम मुझे अपनी जान बताते हो ,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब मैं सोती हूँ तुम्हारे सीने पर सर रख कर ,

तुम पलकों पर मेरी फिर वही खवाब सजाते हो ,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,


जब तुम मेरे गले मैं बाहे डाल देते हो,और मैं खो जाती हूँ

तब तुम मेरी आँखों से उतर कर मेरे दिल मैं समां जाते हो ,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,



जब तुम मेरी चोटी बनाते हो,

और होंठों से मेरी गर्दन को सहलाते हो ,

मैं तो मर ही जाती हूँ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,


रोज मुझे चाँद ,

और खुद को मेरा महबूब बतलाते हो,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब तुम अपने हाथों से बिंदिया ,

और मेरी मांग सजाते हो,

मैं तो मर ही जाती हूँ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

कतरा कतरा बिखर जाती हूँ रात भर तुम्हारी बाहों मे ,

फिर भी तुम मुझे सुबह तक समेट लाते हो,

मैं तो मर ही जाती हूँ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,


रात भर मुझ पर बेशुमार प्यार लुटाते हो,

सुबह होते ही खुद को मासूम और मुझको नीलम बताते हो,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो.
 

Wednesday, January 12, 2011

मुस्कान

 
 
उस सुंदर सी मुस्कान के पीछे
आँखों से मोती झरते थे!

भीगे भीगे कुछ सपने थे,
कुछ टूटे ,कुछ छूटे अपने थे!

उस सुंदर सी मुस्कान के पीछे,
आँखों से मोती  झरते थे!

कुछ पिघले पिघले पल अपने थे,
कुछ लम्हे भी तो कल अपने थे!

उस सुंदर सी मुस्कान के पीछे ,
आँखों से मोती झरते थे!

राहों मे यूँही चलते चलते,
मजिल से पहले वो हमसे रूठ चुके थे!

उस सुंदर सी  मुस्कान के पीछे ,
आँखों से मोती  झरते थे!

तन उसका भी गीला था, मन मेरा भी भीगा था,
आँखों की बरसात के चलते!

उस सुंदर सी मुस्कान के पीछे ,
आँखों से मोती  झरते थे!