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Wednesday, May 18, 2011

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात.....







likh dala hai naam tumhara panno par, 
ro padi to mit jaayegi meri jhooti aas ,

jao mujhe nahi karni aab tumse koi baat.

chhoo jaate ho kyun ahsaas bankar,
kisi din jal kar ban jayungi main rakh.


jao mujhe nahi karni tumse koi baat

katra katra yunhi bikharti rahi agar mai....!
to rah jaayungi ek din main ban kewal laash 


jao mujhe nahi karni tumse koi baat,


milte nahi ho khaayaaalon main bhi theek se,
de jaate ho adhi adhuri pyaaas,


jao mujhe nahi karni tumse koi baat.

kitna sataate ho aa ake khawabon main,
kyun de jaate ho ek tooti hue si आस,



jao mujhe nahi karni tumse koi baat.

kyun jalate ho umeedon ke diye, 
lag jati meri sukhi choukhat par aag.

jao mujhe nahi karni tumse koi baat.
>>>>>>>>>><<<<<<<


लिख डाला है नाम तुम्हारा पन्नो पर ,
रो पड़ी तो मिट जायेगी मेरी झूठी आस,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात,

छू जाते हो क्यूँ अहसास बनकर ,
किसी दिन जलकर बन जयुंगी मैं राख ,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात,

कतरा कतरा यूँही बिखरती रही अगर मैं,
तो रह जयुंगी इक दिन मैं बन केवल लाश ,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात,

मिलते नहीं हो खयालो में भी ठीक से,
दे जाते हो आधी अधूरी प्यास,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात,

कितना सताते हो आ आ के ख्वाबो में,
क्यूँ दे जाते हो टूटी  हुई सी इक आस,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात,

क्यूँ जलाते हो उमीदो के दिए ,
लग जाती हाई मेरी सुखी चौखट पर आग,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात.

[नीलम]

Tuesday, May 3, 2011

चुप हो जा मुझसे मत कहना...




चलते चलते थक गयी हूँ,
कब तू छोड़ गया मेरा साथ ,किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

इक उम्मीद तेरे आने की, 
मैं उसमे जलायुं अपने दिन और रात,किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

इक दर्द उठा तेरे सीने में,
मेरे दिल के भी है दर्द हज़ार ,किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

छलक जाते हैं तेरी आँखों के भी आंसूं ,
मेरी पलकों की बिन बदली बरसात , किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

इक करवट उधर तू बदले,
इधर मैं बदलू करवट बार बार, किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

इक तनहा चाँद तेरे अंगान का,
मेरे भी आँगन मैं टूटे तारे हज़ार ,किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

कब दामन छुटा, कब आस टूटी ,किसी से मत कहना,
ये राज की है बात,ये राज़ किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

मैं यूँही बैठी रही तेरी दहलीज़ पर ,
कब ,किस दिन टूटी नीलम की आस, किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,
[नीलम]

Friday, February 18, 2011

लफ्ज़




आज वो फिर आई थी,


कुछ बिखरे ,कुछ उलझे हुए लफ्ज़ लेकर ,

और जाते हुए मुझसे कह गयी,

अपने बिखरे हुए लफ्ज़ समेटने को,

और साथ ही सवाल भी कर गयी...

क्या समेट पायोगे मेरे बिखरे,उलझे लफ्ज़...

शायद उसे अहसास ही नहीं,

के में खुद कितना बिखरा हुआ हूँ,

लेकिन ,फिर भी हर बार की तरह,

इस बार भी कोशिश कर रहा हूँ,

उसके बिखरे,उलझे लफ़्ज़ों को समेटने की,

जिन्हें वो गीत की तरह गाना चाहती है,

ग़ज़ल की तरह गुनगुनाना चाहती है,

उसका एक एक लफ्ज़ मेरी नसों में बह रहा है लहू बन कर,

उसके बिखरे लफ़्ज़ों को लिखता हूँ उसके लिए,

जी तो बहुत चाहता है....

के वो भी कभी मेरे बिखरे लफ़्ज़ों को समेटे,

मगर ,कह नहीं पता,

क्युंकी में उसे टूटते हुए नहीं देखना चाहता,

नहीं चाहता की वो भी बिखर जाए मेरी तरह,

इसलिए हर बार की तरह,

खुद को उसके लफ़्ज़ों में समेट उसकी नज़र कर देता हूँ,

जिन्हें पढ़ कर वो अपनी बेजान मुस्कुराहटों को सेंक लेती है,

कुछ पल के लिए,

और उस वक़्त उसके खामोश से लब,

कुछ समेटे हुए लफ्ज़ मेरे लिए कह जाते हैं,

और फिर से वादा कर जाती है जाते हुए...

फिर से बिखरे हुए लफ्ज़ दे जाने का,

और कह जाती है...

कल तुम मेरे लफ्ज़ नहीं,

मुझे समेट लेना,

खुद में,

ताकि में फिर कभी मै बिखरे लफ्ज़ लेकर ना आयूँ,

क्युंकी मैं जान गयी हूँ,

तुम अब मुझको खुद में समेट चुके हो.
 

Friday, February 4, 2011

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो.



जब मैं रूठ जाती हूँ ,


और तब तुम मुझे अपनी जान बताते हो ,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब मैं सोती हूँ तुम्हारे सीने पर सर रख कर ,

तुम पलकों पर मेरी फिर वही खवाब सजाते हो ,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,


जब तुम मेरे गले मैं बाहे डाल देते हो,और मैं खो जाती हूँ

तब तुम मेरी आँखों से उतर कर मेरे दिल मैं समां जाते हो ,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,



जब तुम मेरी चोटी बनाते हो,

और होंठों से मेरी गर्दन को सहलाते हो ,

मैं तो मर ही जाती हूँ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,


रोज मुझे चाँद ,

और खुद को मेरा महबूब बतलाते हो,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब तुम अपने हाथों से बिंदिया ,

और मेरी मांग सजाते हो,

मैं तो मर ही जाती हूँ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

कतरा कतरा बिखर जाती हूँ रात भर तुम्हारी बाहों मे ,

फिर भी तुम मुझे सुबह तक समेट लाते हो,

मैं तो मर ही जाती हूँ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,


रात भर मुझ पर बेशुमार प्यार लुटाते हो,

सुबह होते ही खुद को मासूम और मुझको नीलम बताते हो,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो.
 

Wednesday, January 12, 2011

मुस्कान

 
 
उस सुंदर सी मुस्कान के पीछे
आँखों से मोती झरते थे!

भीगे भीगे कुछ सपने थे,
कुछ टूटे ,कुछ छूटे अपने थे!

उस सुंदर सी मुस्कान के पीछे,
आँखों से मोती  झरते थे!

कुछ पिघले पिघले पल अपने थे,
कुछ लम्हे भी तो कल अपने थे!

उस सुंदर सी मुस्कान के पीछे ,
आँखों से मोती झरते थे!

राहों मे यूँही चलते चलते,
मजिल से पहले वो हमसे रूठ चुके थे!

उस सुंदर सी  मुस्कान के पीछे ,
आँखों से मोती  झरते थे!

तन उसका भी गीला था, मन मेरा भी भीगा था,
आँखों की बरसात के चलते!

उस सुंदर सी मुस्कान के पीछे ,
आँखों से मोती  झरते थे!
 

 

Tuesday, December 28, 2010

.!! माँ....!!


















.
.
माँ....!! माँ....!!
दिल की गहराईयों से निकला हुआ एक दिव्य शब्द,
जैसे ही मैं माँ को पुकारती ,
वो गहरी निद्रा से भी उठ कर मुझे अपनी बाहों मैं भर लेती,
और कहती क्या हुआ मेरी रानी बिटिया को,
डर गयी थी क्या!
और तब मैं उसे अपने पुरे  दम से भीच लेती अपने में 

माँ की बाहों का घेरा
मेरे लिए होता एक ठोस सुरक्षा कवच,
फिर डर को भूल उसकी गोद मैं आराम से सो जाया करती,
तब इस बात से होती अनजान की वो भी तो सोएगी....
और माँ अपनी आँखों की नींद चुपके से मेरी पलकों पर
रख कर ममता से भरी नज़रों से निहारा करती

और इसी तरह सुबह का सूरज का हो जाता आगाज
माँ की देहलीज़ पर,
और माँ धीरे से मेरा सर तकिये पर रख कर उठ जाया करती थीं,
हम सभी के लिए,
तब क्यूँ नहीं सोचा कभी माँ के लिए,

आज माँ बन जाने के बाद ,
माँ का हम सब के प्रति समर्पित होना समझ में आता है ,
कितनी ख़ुशी मिलती है अपना सर्वस्व अपने बच्चों पर न्योछावर करके,
खुद को अपने बच्चो में जीना किता देता है ख़ुशी....
भले वो नींद हो, समय हो, या हो  हंसी ,
या फिर ...
निस्वार्थ ममता.!!!!!



Monday, December 27, 2010

माँ ...

माँ....!! माँ....!!




दिल की गहराईयों से निकला हुआ एक दिव्य शब्द,



जैस ही मैं माँ को पुकारती ,



वो गहरी निद्रा से भी उठ कर मुझे अपनी बाहों मैं भर लेती,



और कहती क्या हुआ मेरी रानी बिटिया को,



डर गयी थी क्या!



और तब मैं उसे अपने पुरे दम से भीच लेती अपने में



माँ की बाहों का घेरा



मेरे लिए होता एक ठोस सुरक्षा कवच,



फिर डर को भूल उसकी गोद मैं आराम से सो जाया करती,



तब इस बात से होती अनजान की वो भी तो सोएगी....



और माँ अपनी आँखों की नींद चुपके से मेरी पलकों पर



रख कर ममता से भरी नज़रों से निहारा करती



और इसी तरह सुबह का सूरज का हो जाता आगाज



माँ की देहलीज़ पर,



और माँ धीरे से मेरा सर तकिये पर रख कर उठ जाया करती थीं,



हम सभी के लिए,



तब क्यूँ नहीं सोचा कभी माँ के लिए,



आज माँ बन जाने के बाद ,



माँ का हम सब के प्रति समर्पित होना समझ में आता है ,



कितनी ख़ुशी मिलती है अपना सर्वस्व अपने बच्चों पर न्योछावर करके,



खुद को अपने बच्चो में जीना किता देता है ख़ुशी....



भले वो नींद हो, समय हो, या हो हंसी ,



या फिर ...



निस्वार्थ ममता.!!!!!

Thursday, October 28, 2010

इंतज़ार........


 

दिन बिताये तुम्हारे इंतज़ार मे,

काट ली रातें, मैंने आँखों मे,

ना तुम आये लौट कर कभी ,

ना कभी खवाब आये रातों मे,

दिन भर मुस्कुराई तुम्हारा ख़याल करके,

और तुम्हे याद कर अश्क बहाए रातों मे,

तुम मिलते, तो गिला करती तुमसे,

खुद से शिकवे किये मैंने रातों मे,

तुमसे मिलना हुआ बस ख्यालों मे,

और यूँही मिलती रही जज्बातों से ,

आस अधूरी ही रही मिलन,

सावन की बरसातों मे,

वो कैसे जानता मेरे दिल की बात ,

जब कोई बात हुए ही नहीं अल्फाज़ो मे,

चाँद रोज निकलता है चाँदनी लेकर

और मैं सुलग रही हूँ रातों मे,

धरती मिलती है क्या कभी गगन से,

या फिर यूँही सफ़र किये जा रही हूँ कई सालों से ....



Wednesday, September 29, 2010

क्यूँ ......


































क्यूँ ......
आज कल कुछ सूझता नहीं मुझे,
क्या कहूँ मैं तुमसे?
तुम ही कुछ कहो ना...
जब से तुमने मुझे अपना मान लिया है ,
ना जाने तब से शब्द कहाँ खो गए हैं,
बस अब धड़कने और मेरी साँसे बोलती हैं ,
ना जाने ,क्यूँ तुम उन्हें नहीं सुनते,
क्यूँ अपनी धडकनों से मेरी धडकनों की बात नहीं करते,
कल रात भी जब मैं तुम्हारे सीने पर सर रख कर बहुत कुछ कह रही थी ,

ख़ामोश से मेरे लब ,
शब्दों का बोझ उठा नहीं पा रहे थे,
तब मेरी धड़कने सब कह रहीं थीं,
तब भी तुमने कुछ नहीं सुना था,
है ना!!!!!
बस एक टक निहारते रहते हो मुझे ,
चूमते रहते हो मेरी बंद पलकों को,
और उस वक़्त...
मैं मर कर भी जी उठती हूँ ,
तुम्हारी बाहों में,
वादा करो.......
तुम मुझे यूँही जिंदा रखोगे ,
अपने ख्यालों में,
जैसे मैंने आज तक तुम्हे जिंदा रखा है अपनी रूह में ,
पल पल मरने के बाद भी ,
जी रही हूँ सिर्फ तुम्हारे लिए.

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क्यूँ ......

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Thursday, September 16, 2010

इतंजार















इंतज़ार......


और बस इंतज़ार...

कब ख़त्म होगा ये इंतज़ार,

क्या तब ...

जब मैं बिखर जायुंगी,

या तब....

जब मैं सिमट नहीं पायुंगी,

क्यूँ ख़त्म नहीं होता अमावस की रात सा इंतज़ार,

सूनी राह पर पडे मील के पत्थर का इंतज़ार,

उफ्फ ये इंतज़ार,

क्यूँ कर रही हूँ ,और किसका कर रही हूँ मैं इंतज़ार,

क्या उसका, जो कभी ना लौट आने के लिए चला गया ,

या फिर उसका ..

जो बस उम्मीद दे गया लौट आने की,

जानती हूँ व्यर्थ है अब इंतज़ार...

फिर भी पलकें बिछाए कर रही हूँ इंतज़ार..

जबकि जानती हूँ ,

अब बस उतना ही समय रह गया है मेरे पास ,

जितना हाथ से फिसलती हुई रेत के पास होता है,

मुट्ठी मे रहने का ,

अब कहो...

क्या इतनी जल्दी आ पायोगे

क्या मुझे अपनी हथेलियों मे समेटे रख सकोगे,

नहीं ना....

क्युंकी तुमने मुझे रेत से बढ़ कर कभी अपनी हथेलियों मैं समेटा ही नहीं,

क्युंकी मैं सच मे रेत हूँ ,

और तुम समय,

तुम मेरे लिए कब रुके हो?

कभी नहीं....

लेकिन...

मैं आज भी रुकी हुई हूँ,

सूनी राहों मे तुम्हारी यादों को हमसफ़र बना कर ,

मैं आज भी कर रही हूँ,

तुम्हारा इंतज़ार............


Monday, August 16, 2010

मेरे खबाब


कुछ मेरी अनकही,
कुछ अपनी कही हुए वो सब बातें,
सब उकेर दो कागजों पर,
कुछ सपने लिखना ,
कुछ लम्हे लिखना,
जिन्हें अक्सर जीती हूँ मैं तुम्हारे लिए ,
कुछ रातें,
कुछ बीते हुए, अहसास भी लिख देना,
जीना चाहती हूँ मैं फिर से वही अहसास,
फिर से सजा लुंगी अपनी आँखों में,
भर लुंगी उन्हें मोतियों की तरह,
लेकिन तुम्हे आज एक वादा करना होगा,
इन मोतियों को गिरने नहीं दोगे कभी,
किसी और के कंधे पर,
खा लो कसम...
समेट लोगे मुझे,
मेरे खवाबों को सजा लोगे अपनी पलकों पर
मेरे लिए तोड़  लाओगे वो चाँद,
जो रोज़ मुझे और मेरी मोहब्बत को निहारा करता है,
अक्सर तुम्हारी खिड़की से,
इस बार छिपा दूंगी में उसे किसी कोने में,
नहीं चाहिए तुम्हारे होते हुए मुझे चाँद और चांदनी.
और फिर बस में और तुम, और हमारी रात,
तुम और तुम्हारी बात.
बस तुम और तुम्हारी, मेरी बात.

Thursday, July 22, 2010

साया


यहीं तो हूँ मैं,

कहाँ जा सकती हूँ अब,

कहीं भी तो नहीं,

बस खुद को खुद में,

तो कभी तुम में खुद को तलाशती रहती हूँ ,

जो साया तुम्हारे पीछे है,

कहीं वो मेरा तो नहीं,

या शायद जो साया मेरे साथ है,

वो तुम्हारा तो नहीं,

बस यूँही भटकती रहती हूँ मैं अक्सर अंधेरों में ,

लेकिन देखो ना ,

फिर भी गुम नहीं हो पाती हूँ मैं,

क्यूंकि तुम मुझे ढूंढ ही लाते हो,

कभी ख्यालों में,

कभी खवाबों में,

तुम कब हाथ थाम लेते हो

पता ही नहीं चलता,

इसीलिए खुद को तन्हा भी तो नहीं कह सकती हूँ में,

तुम्हारा अहसास भर रोज़ मुझे चंद साँसे दे जाता है,

तुम्हे जीने के लिए ,

तुम में ,

खुद को फिर से ढूंढ लाने के लिए,

तुम्हारे नज़दीक आने के लिए,

जब तुम छू लेते हो ,मेरे नर्म गर्म होंठों को ,

तब मैं मर कर भी जी उठती हूँ ,

तुम्हारी आगोश में,

क्यूँ तुम मुझे यूँही नहीं पड़े रहने देना चाहते ,



अपनी आगोश में ,

बस आज मुझे मर जाने दो अपनी बाहों में ,

बस एक बार,

बस इस बार,

बस आखिरी बार....

 

Thursday, July 1, 2010

~: शब्द :~


आज कुछ शब्द खुद के लिए बो देना चाहती हूँ
शायद कोई फूल, कोई शाख खिल उठे मेरे लिए
जानती हूँ,
उगा रही हूँ, बंजर जमीन पर
उगेगा तो क्या अंकुरित भी नहीं हो पायेगा
लेकिन अपने तसल्ली के लिए उगा लेना चाहती हूँ
अपने खबाब के बंजर जमीन पर
कुछ शब्द अपने लिए
जिन्हें आज तक बोया तो बहुत बार
लेकिन काटने की रुत आने से पहले ही मुरझा जाते हैं
शायद मेरे आँखों का पानी कम हो गया
उन्हें सींचने के लिए
चलो फिर से कोई घाव दे दो मुझे
ताकि नयनों का नीर सूखने न पाए
मेरे शब्दों का पौधा मुरझाने न पाए............

Friday, June 25, 2010

Friday, June 11, 2010

कुछ खवाब बंज़र जमीन पर बोना.........





ख्यालों मै खोना
कुछ खवाब बंज़र जमीन पर बोना
कैसा होता है न
ऐसा, जैसे खुद ही मै खो जाना
ख्यालों मै ही सही
पर तेरा हो जाना
रह ताकना उन राहों की
जहाँ कोई लौट कर नहीं आता
उसी रह पर
कैसा लगता है
मील का पत्थर हो जाना
तेरा जाना फिर भी
उम्मीद दे जाता है
तेरा, मेरा हो जाना.

(नीलम)
______________
khayaalon main khona,
kuch khawaab banzar zameen par bona ,
kaisa hota hai naa.
aisa, jaise khud hee main kho jana,
khayaalon main hi sahi,
par tera ho jana,
raah takna un raahon ki ,
jahan koi lout kar nahi aata
usi raah par ,
kaisa lagta hai,
meel ka patther ho jana,
tera jana fir bhee ,
umeed de jata hai
tera ,mera ho jaana.

(Neelam)

Tuesday, May 25, 2010

क्यूंकि सुखा पत्ता हूँ...

तन्हा तन्हा फिरता हूँ ,
क्यूंकि सुखा पत्ता हूँ,

घर तो लगता अपना ही है,
पर दीवारों से डरता हूँ,


जी रहे हैं सभी यहाँ,
में तो पल पल मरता हूँ,

तुम ठहरे रिश्तों के शहंशाह,
में तो अहसास का पुतला हूँ,

वो बिका तो किसी एक का हो गया ,
में तो बिकने के बाद भी बिकता हूँ,

इक बार जो आया तूफ़ान गुलशन में,
अब तक दर दर भटका हूँ,

नहीं आयूंगा लौट कर कभी बहार में,
फिर भी फुहार की हसरत रखता हूँ,

क्यूंकि सुखा पत्ता हूँ.

Monday, April 26, 2010

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो!


जब मै रूठ जाती हूँ
और तब तुम मुझे अपनी जान बताते हो
में तो मर ही जाती हूँ
तुम मुझे कैसे जिन्दा पाते हो!

जब मैं सोती हूँ तुम्हारे सीने पर सर रख कर
तुम पलकों पर मेरी वही खबाब सजाते हो
मैं तो मर ही जाती हूँ
तुम मुझे कैसे जिन्दा पाते हो!

जब तुम मेरे गले मै बाहें डालते हो और मैं खो जाती हूँ
तब तुम मेरे आँखों मै उतर कर दिल मै समां जाते हो
मैं तो मर ही जाती हूँ
तुम मुझे कैसे जिन्दा पाते हो !

जब तुम मेरी चोटी बनाते हो
और ओंठो से मरे गर्दन सहलाते हो
मैं तो मर ही जाती हूँ
तुम मुझे कैसे जिन्दा पाते हो!

रोज मुझे चाँद
और खुद  को मेरा महबूब बतलाते हो
मैं तो मर ही जाती हूँ
तुम मुझे कैसे जिन्दा पाते हो!

जब तुम अपने हाथो से बिंदिया,
और मेरी मांग सजाते हो
मैं तो मर ही जाती हूँ
तुम मुझे कैसे जिन्दा पाते हो !

कतरा कतरा बिखर जाती हूँ रात भर तेरी बाँहों मै,
फिर भी तुम मुझे सुबह तक समेट लाते हो
मैं तो मर ही जाती हूँ
तुम मुझे कैसे जिन्दा पाते हो......!!






Wednesday, March 24, 2010

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो...

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My NotesNotes About MeDrafts
mann to jalta hi hai , kyun ko tan bhi jala dete ho...Share
Mon at 4:52pm | Edit Note | Delete
mere labon ko choo kar kyun aag laga dete ho,
mann to jalta hi hai ,kyun tan ko bhi jala dete ho.

shama jalai thi maine roshni k liye ,
tum hath badha kar kyun use bujha dete ho,
mann to jalta hi hai ,kyun tann ko bhi jala dete ho,

ye jism pighal raha hai katra katra karke,
kyun boond boond pilaate ho, ..
mann to jalta hi hai ,kyun tan ko bhi jala dete ho.

din bhar rahte ho khayalon main, raaton ko bhi jagate ho,
mann to jalta hi hai ,kyun tan ko bhi jalate ho.

jab bhi kabhi tanhaai mein sochti hun tumne,
kyun mere kaan mein kuchh gunguna dete ho,
mann to jalta hi hai kyun tan ko bhi jala dete ho.

jab bhi kuch puchna chahti hoon tumse,
mujhe neelam ,aur khud ko masoom bata dete ho,
mann to jalta hi hai , kyun ko tan bhi jala dete ho.

main "JEET" jaati hun har ek musibat se magar,
jaane kaise tum mujhe hara jaate ho.
mann to jalta hi hai kyun tan bhi jala dete ho.
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Manoj Joshi, Dr. Rajeev Shrivastava, Vijay Krishna Mishra and 3 others like this.
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Neelu Sharma Manoj ji bahut bahut shukriya.
about an hour ago ·

Neelu Sharma Neelima ji...jarra nawaazi ka bahut bahut shukriya.
about an hour ago ·

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो.........Share
Friday, March 19, 2010 at 1:03pm | Edit Note | Delete
जब मैं रूठ जाती हूँ ,
और तब तुम मुझे अपनी जान बताते हो ,
मैं तो मर ही जाती हूँ ,
तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब मैं सोती हूँ तुम्हारे सीने पर सर रख कर ,
तुम पलकों पर मेरी फिर वही खवाब सजाते हो ,
मैं तो मर ही जाती हूँ ,
तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब तुम मेरे गले मैं बाहे डाल देते हो,और मैं खो जाती हूँ
तब तुम मेरी आँखों से उतर कर मेरे दिल मैं समां जाते हो ,
मैं तो मर ही जाती हूँ ,
तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब तुम मेरी चोटी बनाते हो,
और होंठों से मेरी गर्दन को सहलाते हो ,
मैं तो मर ही जाती हूँ,
फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

रोज मुझे चाँद ,
और खुद को मेरा महबूब बतलाते हो,
मैं तो मर ही जाती हूँ ,
फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब तुम अपने हाथों से बिंदिया ,
और मेरी मांग सजाते हो,
मैं तो मर ही जाती हूँ,
फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

कतरा कतरा बिखर जाती हूँ रात भर तुम्हारी बाहों मे ,
फिर भी तुम मुझे सुबह तक समेट लाते हो,
मैं तो मर ही जाती हूँ,
फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,


रात भर मुझ पर बेशुमार प्यार लुटाते हो,
सुबह होते ही खुद को मासूम और मुझको नीलम बताते हो,
मैं तो मर ही जाती हूँ ,
फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो.

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो...

जब मैं रूठ जाती हूँ ,
और तब तुम मुझे अपनी जान बताते हो ,
मैं तो मर ही जाती हूँ ,
तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब मैं सोती हूँ तुम्हारे सीने पर सर रख कर ,
तुम पलकों पर मेरी फिर वही खवाब सजाते हो ,
मैं तो मर ही जाती हूँ ,
तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब तुम मेरे गले मैं बाहे डाल देते हो,और मैं खो जाती हूँ
तब तुम मेरी आँखों से उतर कर मेरे दिल मैं समां जाते हो ,
मैं तो मर ही जाती हूँ ,
तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब तुम मेरी चोटी बनाते हो,
और होंठों से मेरी गर्दन को सहलाते हो ,
मैं तो मर ही जाती हूँ,
फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

रोज मुझे चाँद ,
और खुद को मेरा महबूब बतलाते हो,
मैं तो मर ही जाती हूँ ,
फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब तुम अपने हाथों से बिंदिया ,
और मेरी मांग सजाते हो,
मैं तो मर ही जाती हूँ,
फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

कतरा कतरा बिखर जाती हूँ रात भर तुम्हारी बाहों मे ,
फिर भी तुम मुझे सुबह तक समेट लाते हो,
मैं तो मर ही जाती हूँ,
फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,


रात भर मुझ पर बेशुमार प्यार लुटाते हो,
सुबह होते ही खुद को मासूम और मुझको नीलम बताते हो,
मैं तो मर ही जाती हूँ ,
फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो.