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Wednesday, March 20, 2013

वही नजदिकिया ,





वही नजदीकियां ,
वही फांसले भी थे ,
रहे क़दमों के निशाँ मिटते मगर ,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया...

वही रस्मे...
वही रवायतें भी निभती रहीं ,
भीड़ में रहे दोनों मगर,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया...

कभी शर्म -ओ- हया ,
कभी तपिश-ए-बदन,
रहे जलते -बुझते दोनों मगर ,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया...

वही झुकी पलकें मेरी रहीं ,
वही ख्वाब मेरा तेरे तकिये तले,
रहे जागते दोनों मगर ,इज़हार न तूने किया न मैंने किया,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया...

ज़माने की खातिर मैं हो गयी बे-वफ़ा,
बिन मिले बिछड़े दोनों मगर,
ना अपने हिस्से का प्यार मैंने किया न तूने किया,
फिर भी इस दिल ने याद तुम्हे बहुत किया.....[नीलम]
 — 

Wednesday, March 13, 2013

ये मेरी साँसे बस तुम्हारे लिये...



ये राते ..
ये मेरी साँसे बस तुम्हारे लिए..

तुम दूर हो तो क्या ..
ये सारी बातें बस  तुम्हारे लिए..

गाती हूँ ग़ज़ल ,
लेकिन गुनगुनायुंगी ये गीत बस तुम्हारे लिए..

मेरी आँखों का सुहाना ख्वाब है तू,
लेकिन आँखों मे कटेगी हर रात बस तुम्हारे लिए,...

ये रिश्ते ये नाते है सबके लिए ,
लेकिन ये अहसास का  सम्बंध तुम्हारे लिए ....

ये जिस्म है सिर्फ उसका ,
लेकिन इसमें बसी जान बस तुम्हारे लिए,...

पतझड़ का फूल हूँ मैं,
लेकिन बसंत की बहार हूँ बस तुम्हारे लिए..

धधकती लो हूँ शमा की मगर ,
पिघलता मोम हूँ बस तुम्हारे लिए...

मेरी मुस्कुराहटो पर ना जायो ,
इनमे छिपा हर अश्क बस तुम्हारे लिए..

बेवफा हूँ तो क्या हुआ,
ये वादा खिलाफी की मैंने बस तुम्हारे लिए...

ये राते ..
ये मेरी सांसे बस तुम्हारे लिए,...

तुम दूर हो तो क्या..
ये सारी बातें बस तुम्हारे लिए...[नीलम]

Saturday, March 9, 2013

मर्द कभी नहीं रोते . . .

**** मर्द कभी नहीं रोते*****
   

मैं बचपन से सुनता आ रहा हूँ,
मर्द कभी नहीं रोते,
और मैं भी कभी नहीं रोया,
मर्द हूँ ना..
जब बहिन के पति का स्वर्गवास हुआ,
तब भी नहीं रोया था मैं,
जबकि जानता था मेरी बहिन का संसार लुट चूका है,
मगर बहिन और भांजे ,भांजियो की जिम्मेदारी जो उठानी थी,
अगर रोता तो कमजोर पड जाता ना मैं,
इसलिए नहीं रोया तब भी,
क्यूंकि जानता था ...
मर्द कभी नहीं रोते,
बेटी का उजड़ा घर देख पिता भी २ साल बाद चल बसे,
तब भी नहीं रोया था मैं,
माँ और छोटे बहिन ,भाई को भी तो संभालना था ना मुझे,
और जानता था,
मर्द कभी नहीं रोते,
इसलिए नहीं रोया था तब भी,
अभी पिता के शोक से उभर नहीं पाया था कि माँ भी चल बसी,
अब हिम्मत टूटने लगी थी ,
लेकिन नहीं रोया था तब भी मैं,
क्यूंकि बहनों, छोटे भाई और उनके बच्चों को जो संभालना था ,
उन्हें दिलासा जो देना था,
कि मैं हूँ ,तुम सबके साथ,
तुम्हारे सर पर रहेगा हमेशा मेरा हाथ ,
तुम्हारे हर सुख दुःख में हूँ मैं तुम्हारे साथ,
और जानता भी था ना...
कि मर्द कभी नहीं रोते,
इसलिए नहीं रोया था तब भी मैं,
बहुत कोशिश की ,
कि नहीं रोना है मुझे,
लेकिन अब मैं भी कमजोर पड़ने लगा था,
छुप छुप के अंधेरों में रोने लगा था,
लेकिन एक दिन अचानक सुबह दफ्तर में किसी का फोन आया,
मेरा दिल तब बहुत जोर से घबराया,
मैंने हिम्मत जुटा कर फोन उठाया ,
वहां से कोई बोला आपके छोटे भाई कि तबियत बहुत बिगड़ गई है,
और वो बार बार बस यही कह रहे हैं,
कि मेरे भाई को बुला दो,
उन्हें बोलो जल्दी से आके मुझे अपने सीने में छुपा ले,
और मैंने झट से फोन पटक दिया,
और बेतहाशा दफ्तर से निकल पड़ा,
जब तक मैं अस्पताल पहुंचा ,
मेरा भाई मुझे छोड़ के चल दिया था,
और मैं ...
बुत बना बस देख रहा था,
बहुत बार याद की बचपन की बात,
कि मर्द कभी नहीं रोते ,
मगर सबके जाने का दुःख अब मुझे तोड़ रहा था ,
हर कोई मुझे अकेला छोड़ कर चले जा रहा था,
और मैं खुद को बस समझा रहा था,
कि मर्द कभी नहीं रोते..
भाई कि पत्नी और उसके नन्हे से बच्चों कि जिम्मेदारी भी अब मुझ पर आन पड़ी है,
उनको भी अब अब संभालना होगा,
और ये दुःख मेरी बहनों से भी झेला ना जायेगा,
लेकिन अब तक जो समन्दर आँखों में बाँध रखा था,
क्यूंकि बचपन से ये मान रखा था ,
कि मर्द कभी नहीं रोते,
अब मैं ये भूल चुका था,
आंसुओं का झरना फूट पड़ा था.
जब भी छोटे भाई के आखिरी शब्द याद आते हैं,
मेरे भाई को बुला दो बस....
तब तब मैं हमेशा भूल जाता हूँ,
कि ..
मर्द कभी नहीं रोते.....
मर्द जब टूट जाता है,
उसका हर अपना जब छूट जाता है,
तब मर्द भी रोते हैं..[नीलम]
 — 

Saturday, November 19, 2011

ख़लल ...





     जाने क्यूँ ख़लल डाल जाती हैं उसकी यादें मेरी ज़िन्दगी में ,
     मैंने तो उसे यूँ कभी ख़्वाबों में भी परेशां किया ना था !!
.[नीलम ] 

Sunday, July 24, 2011

~:कुछ शेर और मुक्तक:~




















कुछ शेर और मुक्तक अर्ज़ कर रही हूँ .आशा करती हूँ जिस तरह आपने मेरे कविताओं को सराहा है और मेरा हौसला बढाया है उसी तरह आप मेरे शेरो शायरी को भी सराहेंगे और मेरा मार्ग दर्शन करेंगे.. अगर कोई गुस्ताखी हो जाए तो मुझे क्षमा कर दीजियेगा ...



१)... आँखों के अश्क बह नहीं पाए, ,

खामोश रहे किसी से कुछ कह नहीं पाए,

किस से कहते दास्ताँ अपने दिल की,

जो था अपना उसे अपना कह नहीं पाए.

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२).जब भी रातों मे तेरी याद आती है ,

वीरान रातों में चाँदनी उतर आती है,

सोचती हूँ तुम मिलोगे खवाबों मे,

मगर ना तुम आते हो ना नींद आती है.

>>>>>>>>>>><<<<<<<<<<<<<<<&


३)मेरी तनहाइयाँ भी अब गुनगुनाने लगी हैं,

हाथों की चूडियाँ कुछ बताने लगी हैं,

ये खनक है शायद उनके आने की,

जिनकी याद में तू अब मुस्कुराने लागी है.



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4).अपने अश्कों को छलकाना चाहती हूँ,

तुझे अपने सीने से लगाना चाहती हूँ,

जहाँ मिलती है ज़मी आसमा से ,

वहां अपना आशियाना बनाना चाहती हूँ.


>>>>>>>>>>>>>>><<<<<<<<<<&

5)रात ढलती गयी ,

दिन भी गुज़रता गया,

उस से मिलने की उम्मीद का,

ये पल भी फिसलता गया.


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चंद शेर अर्ज़ हैं......

१). ना जाने वो कौन लोग थे जिनके ज़ख्म वक़्त भर गया,

हमे तो हर सुबह इक नया ज़ख्म दे जाती है ज़िन्दगी.

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२). खफ़ा भी नहीं हूँ और इस गम से जुदा भी नहीं हूँ,

वजूद तो मेरा भी है यहाँ वहां फिजाओं मे, सिमटी हूँ अभी बिखरी नहीं हूँ


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३). देखिये मेरे इंतज़ार की हद्द है कहाँ तक,

मरने के बाद भी मेरी आँखे खुली रखना.

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४).यूँ ही मुस्कुराती और गुनगुनाती हूँ मैं,

कितना है दर्द दिल मैं खुद से भी छुपाती हूँ मैं.

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5).आन्धिओं मे कहाँ दम था गिरा जाती वो मुझे शाख से,

उसकी हसरत - ए -बहार की खातिर खुद टूट कर गिरा हूँ मैं.


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6).यूँ तो फुर्सत ही फुर्सत है ज़िन्दगी मे,लेकिन

इन दिनों खुद को जिंदा रखने मे बहुत मसरूफ हूँ मैं.


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Wednesday, May 18, 2011

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात.....







likh dala hai naam tumhara panno par, 
ro padi to mit jaayegi meri jhooti aas ,

jao mujhe nahi karni aab tumse koi baat.

chhoo jaate ho kyun ahsaas bankar,
kisi din jal kar ban jayungi main rakh.


jao mujhe nahi karni tumse koi baat

katra katra yunhi bikharti rahi agar mai....!
to rah jaayungi ek din main ban kewal laash 


jao mujhe nahi karni tumse koi baat,


milte nahi ho khaayaaalon main bhi theek se,
de jaate ho adhi adhuri pyaaas,


jao mujhe nahi karni tumse koi baat.

kitna sataate ho aa ake khawabon main,
kyun de jaate ho ek tooti hue si आस,



jao mujhe nahi karni tumse koi baat.

kyun jalate ho umeedon ke diye, 
lag jati meri sukhi choukhat par aag.

jao mujhe nahi karni tumse koi baat.
>>>>>>>>>><<<<<<<


लिख डाला है नाम तुम्हारा पन्नो पर ,
रो पड़ी तो मिट जायेगी मेरी झूठी आस,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात,

छू जाते हो क्यूँ अहसास बनकर ,
किसी दिन जलकर बन जयुंगी मैं राख ,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात,

कतरा कतरा यूँही बिखरती रही अगर मैं,
तो रह जयुंगी इक दिन मैं बन केवल लाश ,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात,

मिलते नहीं हो खयालो में भी ठीक से,
दे जाते हो आधी अधूरी प्यास,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात,

कितना सताते हो आ आ के ख्वाबो में,
क्यूँ दे जाते हो टूटी  हुई सी इक आस,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात,

क्यूँ जलाते हो उमीदो के दिए ,
लग जाती हाई मेरी सुखी चौखट पर आग,

जाओ मुझे नहीं करनी तुमसे कोई बात.

[नीलम]

Tuesday, May 3, 2011

चुप हो जा मुझसे मत कहना...




चलते चलते थक गयी हूँ,
कब तू छोड़ गया मेरा साथ ,किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

इक उम्मीद तेरे आने की, 
मैं उसमे जलायुं अपने दिन और रात,किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

इक दर्द उठा तेरे सीने में,
मेरे दिल के भी है दर्द हज़ार ,किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

छलक जाते हैं तेरी आँखों के भी आंसूं ,
मेरी पलकों की बिन बदली बरसात , किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

इक करवट उधर तू बदले,
इधर मैं बदलू करवट बार बार, किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

इक तनहा चाँद तेरे अंगान का,
मेरे भी आँगन मैं टूटे तारे हज़ार ,किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

कब दामन छुटा, कब आस टूटी ,किसी से मत कहना,
ये राज की है बात,ये राज़ किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,

मैं यूँही बैठी रही तेरी दहलीज़ पर ,
कब ,किस दिन टूटी नीलम की आस, किसी से मत कहना,
मैं रोयुं जार जार तो चुप हो जा मुझसे मत कहना,
[नीलम]

Friday, February 18, 2011

लफ्ज़




आज वो फिर आई थी,


कुछ बिखरे ,कुछ उलझे हुए लफ्ज़ लेकर ,

और जाते हुए मुझसे कह गयी,

अपने बिखरे हुए लफ्ज़ समेटने को,

और साथ ही सवाल भी कर गयी...

क्या समेट पायोगे मेरे बिखरे,उलझे लफ्ज़...

शायद उसे अहसास ही नहीं,

के में खुद कितना बिखरा हुआ हूँ,

लेकिन ,फिर भी हर बार की तरह,

इस बार भी कोशिश कर रहा हूँ,

उसके बिखरे,उलझे लफ़्ज़ों को समेटने की,

जिन्हें वो गीत की तरह गाना चाहती है,

ग़ज़ल की तरह गुनगुनाना चाहती है,

उसका एक एक लफ्ज़ मेरी नसों में बह रहा है लहू बन कर,

उसके बिखरे लफ़्ज़ों को लिखता हूँ उसके लिए,

जी तो बहुत चाहता है....

के वो भी कभी मेरे बिखरे लफ़्ज़ों को समेटे,

मगर ,कह नहीं पता,

क्युंकी में उसे टूटते हुए नहीं देखना चाहता,

नहीं चाहता की वो भी बिखर जाए मेरी तरह,

इसलिए हर बार की तरह,

खुद को उसके लफ़्ज़ों में समेट उसकी नज़र कर देता हूँ,

जिन्हें पढ़ कर वो अपनी बेजान मुस्कुराहटों को सेंक लेती है,

कुछ पल के लिए,

और उस वक़्त उसके खामोश से लब,

कुछ समेटे हुए लफ्ज़ मेरे लिए कह जाते हैं,

और फिर से वादा कर जाती है जाते हुए...

फिर से बिखरे हुए लफ्ज़ दे जाने का,

और कह जाती है...

कल तुम मेरे लफ्ज़ नहीं,

मुझे समेट लेना,

खुद में,

ताकि में फिर कभी मै बिखरे लफ्ज़ लेकर ना आयूँ,

क्युंकी मैं जान गयी हूँ,

तुम अब मुझको खुद में समेट चुके हो.
 

Friday, February 4, 2011

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो.



जब मैं रूठ जाती हूँ ,


और तब तुम मुझे अपनी जान बताते हो ,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब मैं सोती हूँ तुम्हारे सीने पर सर रख कर ,

तुम पलकों पर मेरी फिर वही खवाब सजाते हो ,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,


जब तुम मेरे गले मैं बाहे डाल देते हो,और मैं खो जाती हूँ

तब तुम मेरी आँखों से उतर कर मेरे दिल मैं समां जाते हो ,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,



जब तुम मेरी चोटी बनाते हो,

और होंठों से मेरी गर्दन को सहलाते हो ,

मैं तो मर ही जाती हूँ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,


रोज मुझे चाँद ,

और खुद को मेरा महबूब बतलाते हो,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

जब तुम अपने हाथों से बिंदिया ,

और मेरी मांग सजाते हो,

मैं तो मर ही जाती हूँ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,

कतरा कतरा बिखर जाती हूँ रात भर तुम्हारी बाहों मे ,

फिर भी तुम मुझे सुबह तक समेट लाते हो,

मैं तो मर ही जाती हूँ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो,


रात भर मुझ पर बेशुमार प्यार लुटाते हो,

सुबह होते ही खुद को मासूम और मुझको नीलम बताते हो,

मैं तो मर ही जाती हूँ ,

फिर तुम मुझे कैसे जिंदा पाते हो.
 

Wednesday, January 12, 2011

मुस्कान

 
 
उस सुंदर सी मुस्कान के पीछे
आँखों से मोती झरते थे!

भीगे भीगे कुछ सपने थे,
कुछ टूटे ,कुछ छूटे अपने थे!

उस सुंदर सी मुस्कान के पीछे,
आँखों से मोती  झरते थे!

कुछ पिघले पिघले पल अपने थे,
कुछ लम्हे भी तो कल अपने थे!

उस सुंदर सी मुस्कान के पीछे ,
आँखों से मोती झरते थे!

राहों मे यूँही चलते चलते,
मजिल से पहले वो हमसे रूठ चुके थे!

उस सुंदर सी  मुस्कान के पीछे ,
आँखों से मोती  झरते थे!

तन उसका भी गीला था, मन मेरा भी भीगा था,
आँखों की बरसात के चलते!

उस सुंदर सी मुस्कान के पीछे ,
आँखों से मोती  झरते थे!
 

 

Tuesday, December 28, 2010

.!! माँ....!!


















.
.
माँ....!! माँ....!!
दिल की गहराईयों से निकला हुआ एक दिव्य शब्द,
जैसे ही मैं माँ को पुकारती ,
वो गहरी निद्रा से भी उठ कर मुझे अपनी बाहों मैं भर लेती,
और कहती क्या हुआ मेरी रानी बिटिया को,
डर गयी थी क्या!
और तब मैं उसे अपने पुरे  दम से भीच लेती अपने में 

माँ की बाहों का घेरा
मेरे लिए होता एक ठोस सुरक्षा कवच,
फिर डर को भूल उसकी गोद मैं आराम से सो जाया करती,
तब इस बात से होती अनजान की वो भी तो सोएगी....
और माँ अपनी आँखों की नींद चुपके से मेरी पलकों पर
रख कर ममता से भरी नज़रों से निहारा करती

और इसी तरह सुबह का सूरज का हो जाता आगाज
माँ की देहलीज़ पर,
और माँ धीरे से मेरा सर तकिये पर रख कर उठ जाया करती थीं,
हम सभी के लिए,
तब क्यूँ नहीं सोचा कभी माँ के लिए,

आज माँ बन जाने के बाद ,
माँ का हम सब के प्रति समर्पित होना समझ में आता है ,
कितनी ख़ुशी मिलती है अपना सर्वस्व अपने बच्चों पर न्योछावर करके,
खुद को अपने बच्चो में जीना किता देता है ख़ुशी....
भले वो नींद हो, समय हो, या हो  हंसी ,
या फिर ...
निस्वार्थ ममता.!!!!!



Monday, December 27, 2010

माँ ...

माँ....!! माँ....!!




दिल की गहराईयों से निकला हुआ एक दिव्य शब्द,



जैस ही मैं माँ को पुकारती ,



वो गहरी निद्रा से भी उठ कर मुझे अपनी बाहों मैं भर लेती,



और कहती क्या हुआ मेरी रानी बिटिया को,



डर गयी थी क्या!



और तब मैं उसे अपने पुरे दम से भीच लेती अपने में



माँ की बाहों का घेरा



मेरे लिए होता एक ठोस सुरक्षा कवच,



फिर डर को भूल उसकी गोद मैं आराम से सो जाया करती,



तब इस बात से होती अनजान की वो भी तो सोएगी....



और माँ अपनी आँखों की नींद चुपके से मेरी पलकों पर



रख कर ममता से भरी नज़रों से निहारा करती



और इसी तरह सुबह का सूरज का हो जाता आगाज



माँ की देहलीज़ पर,



और माँ धीरे से मेरा सर तकिये पर रख कर उठ जाया करती थीं,



हम सभी के लिए,



तब क्यूँ नहीं सोचा कभी माँ के लिए,



आज माँ बन जाने के बाद ,



माँ का हम सब के प्रति समर्पित होना समझ में आता है ,



कितनी ख़ुशी मिलती है अपना सर्वस्व अपने बच्चों पर न्योछावर करके,



खुद को अपने बच्चो में जीना किता देता है ख़ुशी....



भले वो नींद हो, समय हो, या हो हंसी ,



या फिर ...



निस्वार्थ ममता.!!!!!

Thursday, October 28, 2010

इंतज़ार........


 

दिन बिताये तुम्हारे इंतज़ार मे,

काट ली रातें, मैंने आँखों मे,

ना तुम आये लौट कर कभी ,

ना कभी खवाब आये रातों मे,

दिन भर मुस्कुराई तुम्हारा ख़याल करके,

और तुम्हे याद कर अश्क बहाए रातों मे,

तुम मिलते, तो गिला करती तुमसे,

खुद से शिकवे किये मैंने रातों मे,

तुमसे मिलना हुआ बस ख्यालों मे,

और यूँही मिलती रही जज्बातों से ,

आस अधूरी ही रही मिलन,

सावन की बरसातों मे,

वो कैसे जानता मेरे दिल की बात ,

जब कोई बात हुए ही नहीं अल्फाज़ो मे,

चाँद रोज निकलता है चाँदनी लेकर

और मैं सुलग रही हूँ रातों मे,

धरती मिलती है क्या कभी गगन से,

या फिर यूँही सफ़र किये जा रही हूँ कई सालों से ....



Wednesday, September 29, 2010

क्यूँ ......


































क्यूँ ......
आज कल कुछ सूझता नहीं मुझे,
क्या कहूँ मैं तुमसे?
तुम ही कुछ कहो ना...
जब से तुमने मुझे अपना मान लिया है ,
ना जाने तब से शब्द कहाँ खो गए हैं,
बस अब धड़कने और मेरी साँसे बोलती हैं ,
ना जाने ,क्यूँ तुम उन्हें नहीं सुनते,
क्यूँ अपनी धडकनों से मेरी धडकनों की बात नहीं करते,
कल रात भी जब मैं तुम्हारे सीने पर सर रख कर बहुत कुछ कह रही थी ,

ख़ामोश से मेरे लब ,
शब्दों का बोझ उठा नहीं पा रहे थे,
तब मेरी धड़कने सब कह रहीं थीं,
तब भी तुमने कुछ नहीं सुना था,
है ना!!!!!
बस एक टक निहारते रहते हो मुझे ,
चूमते रहते हो मेरी बंद पलकों को,
और उस वक़्त...
मैं मर कर भी जी उठती हूँ ,
तुम्हारी बाहों में,
वादा करो.......
तुम मुझे यूँही जिंदा रखोगे ,
अपने ख्यालों में,
जैसे मैंने आज तक तुम्हे जिंदा रखा है अपनी रूह में ,
पल पल मरने के बाद भी ,
जी रही हूँ सिर्फ तुम्हारे लिए.

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क्यूँ ......

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Thursday, September 16, 2010

इतंजार















इंतज़ार......


और बस इंतज़ार...

कब ख़त्म होगा ये इंतज़ार,

क्या तब ...

जब मैं बिखर जायुंगी,

या तब....

जब मैं सिमट नहीं पायुंगी,

क्यूँ ख़त्म नहीं होता अमावस की रात सा इंतज़ार,

सूनी राह पर पडे मील के पत्थर का इंतज़ार,

उफ्फ ये इंतज़ार,

क्यूँ कर रही हूँ ,और किसका कर रही हूँ मैं इंतज़ार,

क्या उसका, जो कभी ना लौट आने के लिए चला गया ,

या फिर उसका ..

जो बस उम्मीद दे गया लौट आने की,

जानती हूँ व्यर्थ है अब इंतज़ार...

फिर भी पलकें बिछाए कर रही हूँ इंतज़ार..

जबकि जानती हूँ ,

अब बस उतना ही समय रह गया है मेरे पास ,

जितना हाथ से फिसलती हुई रेत के पास होता है,

मुट्ठी मे रहने का ,

अब कहो...

क्या इतनी जल्दी आ पायोगे

क्या मुझे अपनी हथेलियों मे समेटे रख सकोगे,

नहीं ना....

क्युंकी तुमने मुझे रेत से बढ़ कर कभी अपनी हथेलियों मैं समेटा ही नहीं,

क्युंकी मैं सच मे रेत हूँ ,

और तुम समय,

तुम मेरे लिए कब रुके हो?

कभी नहीं....

लेकिन...

मैं आज भी रुकी हुई हूँ,

सूनी राहों मे तुम्हारी यादों को हमसफ़र बना कर ,

मैं आज भी कर रही हूँ,

तुम्हारा इंतज़ार............


Monday, August 16, 2010

मेरे खबाब


कुछ मेरी अनकही,
कुछ अपनी कही हुए वो सब बातें,
सब उकेर दो कागजों पर,
कुछ सपने लिखना ,
कुछ लम्हे लिखना,
जिन्हें अक्सर जीती हूँ मैं तुम्हारे लिए ,
कुछ रातें,
कुछ बीते हुए, अहसास भी लिख देना,
जीना चाहती हूँ मैं फिर से वही अहसास,
फिर से सजा लुंगी अपनी आँखों में,
भर लुंगी उन्हें मोतियों की तरह,
लेकिन तुम्हे आज एक वादा करना होगा,
इन मोतियों को गिरने नहीं दोगे कभी,
किसी और के कंधे पर,
खा लो कसम...
समेट लोगे मुझे,
मेरे खवाबों को सजा लोगे अपनी पलकों पर
मेरे लिए तोड़  लाओगे वो चाँद,
जो रोज़ मुझे और मेरी मोहब्बत को निहारा करता है,
अक्सर तुम्हारी खिड़की से,
इस बार छिपा दूंगी में उसे किसी कोने में,
नहीं चाहिए तुम्हारे होते हुए मुझे चाँद और चांदनी.
और फिर बस में और तुम, और हमारी रात,
तुम और तुम्हारी बात.
बस तुम और तुम्हारी, मेरी बात.

Thursday, July 22, 2010

साया


यहीं तो हूँ मैं,

कहाँ जा सकती हूँ अब,

कहीं भी तो नहीं,

बस खुद को खुद में,

तो कभी तुम में खुद को तलाशती रहती हूँ ,

जो साया तुम्हारे पीछे है,

कहीं वो मेरा तो नहीं,

या शायद जो साया मेरे साथ है,

वो तुम्हारा तो नहीं,

बस यूँही भटकती रहती हूँ मैं अक्सर अंधेरों में ,

लेकिन देखो ना ,

फिर भी गुम नहीं हो पाती हूँ मैं,

क्यूंकि तुम मुझे ढूंढ ही लाते हो,

कभी ख्यालों में,

कभी खवाबों में,

तुम कब हाथ थाम लेते हो

पता ही नहीं चलता,

इसीलिए खुद को तन्हा भी तो नहीं कह सकती हूँ में,

तुम्हारा अहसास भर रोज़ मुझे चंद साँसे दे जाता है,

तुम्हे जीने के लिए ,

तुम में ,

खुद को फिर से ढूंढ लाने के लिए,

तुम्हारे नज़दीक आने के लिए,

जब तुम छू लेते हो ,मेरे नर्म गर्म होंठों को ,

तब मैं मर कर भी जी उठती हूँ ,

तुम्हारी आगोश में,

क्यूँ तुम मुझे यूँही नहीं पड़े रहने देना चाहते ,



अपनी आगोश में ,

बस आज मुझे मर जाने दो अपनी बाहों में ,

बस एक बार,

बस इस बार,

बस आखिरी बार....

 

Thursday, July 1, 2010

~: शब्द :~


आज कुछ शब्द खुद के लिए बो देना चाहती हूँ
शायद कोई फूल, कोई शाख खिल उठे मेरे लिए
जानती हूँ,
उगा रही हूँ, बंजर जमीन पर
उगेगा तो क्या अंकुरित भी नहीं हो पायेगा
लेकिन अपने तसल्ली के लिए उगा लेना चाहती हूँ
अपने खबाब के बंजर जमीन पर
कुछ शब्द अपने लिए
जिन्हें आज तक बोया तो बहुत बार
लेकिन काटने की रुत आने से पहले ही मुरझा जाते हैं
शायद मेरे आँखों का पानी कम हो गया
उन्हें सींचने के लिए
चलो फिर से कोई घाव दे दो मुझे
ताकि नयनों का नीर सूखने न पाए
मेरे शब्दों का पौधा मुरझाने न पाए............

Friday, June 25, 2010