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Sunday, October 2, 2016

कोरे पन्नें

सही कहती हो
तुम लिखना कहाँ जानती हो
तुम तो सिर्फ मुझे पढ. गढ रही हो
तुम पी रही हो अपने हिस्से का समन्दर
और मैं
झरने सा कल कल करता जल बन समा रहा तुझमे
तुम पी रही हो उतारा हुआ अँधेरा
और मैं
मैं जी रहा हूँ तुम्हारा दिया हुआ सवेरा
सच कहती हो
तुम कब मिलती हो मुझे कागज़ की आडी टेडी रेखाओं में .
तुम तो मुझे मिलती हो
मेरी कविताओं में
हाँ ...
अब मैने भी कोरे पन्नों को छू कर
तुम्हे जान लिया है
इसिलिये तो
बिन छुए
तुम्हे अपना मान लिया है

...नीलम...

कहानियाँ

ओह !!!
तो क्या मैं सिर्फ तुम्हारी कहानी का हिस्सा भर हूँ
मुझे तो लगा था
मैं ही तुम्हारी कहानी का हीरो हूँ
मगर मैं तुम्हारे लिये मुडे हुए पन्ने के सिवा कुछ भी नहीं
हाँ
पीला तो पडने लगा हूँ  अब
क्योंकि
तुम्हारी नज़र में मैं सिर्फ एक किरदार हूँ
और अब तुम मुझे इत्तेफाक भी तो नहीं मानती हो ना
मगर हमारा मिलना तो इत्तेफाक ही था
इत्तेफाक उग जाया करते हैं
अक्सर तन्हाइयों के जंगल में
और जब तन्हाई को हकीकत की जमीं मिलती है ना
तब हकीकत सिर्फ साजिशें ही रचती है
और
कहानियाँ ...
कहानियाँ एक ना एक दिन तो खत्म
होती ही हैं

नीलम 🙏

लफ्ज

तुम्हारे सारे लफ्ज पुरुष ही तो हैं जो शोर करते हैं भीड में
और मेरे लफ्ज स्त्री .जो खामोशी में भी सुनते है पसरा हुआ सन्नाटा
...नीलम..🙏

Monday, July 18, 2016

ज़ुस्तज़ू

ख्याल भी हसरतें भी और ज़ुस्तज़ू भी हो .क्या खूब हो के उस पर तेरी जरुरत भी ना हो ....नीलम....

Monday, July 11, 2016

तुम जब भी आया करो ....

तुम जब भी आया करो
मुझे मिटा के जाया करो
कफन के साथ-साथ कब्र की मिट्टी भी दबाया करो

मैं उठ खडी होती हूँ
तुम्हारी याद आने पर
अपनी यादों को भी
मेरे साथ ही दफनाया करो .

तुम जब भी आया करो
मुझे मिटा के जाया करो

चार कान्धे थे जो
वो बेगानों के थे
उनमे इक कान्धा
अपना भी लगाया करो

तुम जब भी आया करो
मुझे मिटा के जाया करो .

तुम भी लौट जाना
बाकी गमजदों के साथ
बस अपने अहसास को
मेरे साथ मेरी कब्र में सुलाया करो

तुम जब भी आया करो
मुझे मिटा के जाया करो

वो जो रो रहे थे
वो भी तुम्हारे ही थे
उनसे कह दो
दो अश्क मेरे लिये भी बहाया करो

तुम जब भी आया करो
मुझे मिटा के जाया करो

तुम चढाते हो हर रोज
फ़ूल मेरी कब्र पर
उम्मीद का इक दिया भी तो कभी -कभी जलाया करो

तुम जब भी आया करो
मुझे मिटा के जाया करो
फन के साथ-साथ कब्र की मिट्टी भी
दबाया करो ....@ नीलम...

Monday, July 4, 2016

धूप

धूप....
कहां है धूप मेरी
मुठियों मे
सिर्फ अहसास की गर्मी ही तो
है इन हथेलियों में
जिन्हें कभी छुआ था तुमने
दिसम्बर की जमा
देने वाली सर्दी में
तुम्हारे नरम हाथों की
गरम छुअन लिए
बैठा हूँ मेआज तल
और तुम कहती हो
मेरी मुट्ठीयों में
गुनगुनी धूप बंद है
काश !
तुम अपनी नरम हथेलियां
एक बार फिर मेरी झुलस रही
हथेलियों पर रख पाती ...
तब जान जाती कि
ये गुनगुनी धूप नहीं ,
तुम्हारे नरम हाथों का
गुनगुना अहसास है .... ( नीलम )

तुम रुठा ना करो

उफ़ ..
मेरी धड़कने बढ़ने लगती हैं ,सांसे जमने लगती हैं ,
जिस्म पत्थर हो जाता है ,आँखें छलकने लगती हैं,
देखो, यूँ इस कदर मुझसे तुम रूठा ना करो .....[नीलम] —

Saturday, October 3, 2015

साया

मैं
चली
साजन
तेरे संग
जैसे हो साया
कोई हमदम
लिपटा मेरे संग- -
- - नीलम - -

Thursday, September 24, 2015

दौर - ए - जाम . .

इश्क - ए - मय में मीना थी और साकी भी था
देर तलक दौर - ए - जाम चला दर्द फ़िर भी बाकी था -
- - - नीलम- - -

जटा में गंग धार है . . . .

जटा में गंग धार है
गले में सर्प हार है
बज रहा मृदंग है
शिव नीलकंठ है
भस्म से सजा कपाल है
शरीर पर सिंह छाल है
हिमालय इनका वास है
माँ पार्वती भी साथ हैं
पुत्र कार्तिकेय - गणेश हैं
भक्त इनके अनेक हैं
कर रहे जलाभिषेक हैं
कावड कोई सजा रहा
कोई ढूध से नहला रहा
और सावन बरस कर रहा अभिषेक है
शिव शक्ति बस एक है - - -
- - - - नीलम - - - -

छिलि हुई तन्हाई . .

देखो . . .
ये जो मेरे लबो पर
ठहरी सी मुस्कान तुम्हे दिखाई दे रही है ना
ये वो मुस्कान नहीं
जो तुम समझ रहे हो
ये तो छिलि हुई तन्हाई है
खुरची हुई यादें हैं
कुरेदे हुए
टूटे ख्वाबो की
किरचे हैं
जो मुझे तुम्हारे करीब और करीब ले आते हैं
और ये जो मेरे माथे पर बिखरी लटे देख रहे हो ना
ये वो बदहाली है
जिसे मैं हर रात सुलझाने की नाकाम कोशिश करती हूँ
मेरे हाथों की महँदी का सुर्ख रंग देख रहे हो ना ! !
ये मेरे अंतर्मन के जख्मों से ही सुर्ख हुआ है
अब तुम यकीं करो ना करो
क्या फर्क पड़ता है
क्योंकि तुम तो इश्क की बूँदों से सराबोर हो गये हो ना . . 
तुम क्या जानो . .
तुम्हे सराबोर करने में
तुम्हारे रेगिस्तान को सहरा करने के लिये
कोई कितना रोया होगा . . . 

- - -नीलम - - -

Sunday, September 20, 2015

रूह - ए - पैरहन

तेरे लिबास की सिलवटें कुछ बयान करे ना करे
तेरी रूह ए पैरहन पे अक्सर ठहर जाती है नज़र मेरी - - नीलम - - - -

Saturday, September 19, 2015

देह के परे भी होती है इक देह . . .

देह के परे भी होती है
इक देह . . .
कभी छूना उसे
तब नाप लोगे
सही मायने में
देह से रूह तक की दूरी
और जान जाओगे
मुझमें अपने होने का अहसास
और तब तुम में मैं
और मुझमें तुम
समा जाओगे
देह का मिलन फ़िर रूह के रास्ते होकर
रूह तक चला जायेगा
और तुम्हारा मुझे सिर्फ देह समझना
ये भ्रम भी टूट जायेगा
- - - नीलम - --

जो भी है बस यही इक पल है . . . .

उम्र भले ही कर गई हो
पचास पार . . .
मगर मैं आज भी जीता हूँ तुम्हे
वही अल्हड़ जवानी के जवां शक्स सा
उम्र में वैसे भी रखा क्या है
कौन जाने
कब निकल जायेंगे प्राण
बिना किसी से कुछ कहे
बिना सुने
मौका भी कहाँ देती है जिंदगी
बार बार जिंदगी जीने का
बस . . . .
इसिलए तो मैं
जीता हूँ हर पल
हर लम्हे को तुम सा
जैसे तुम
फ़िर मिलो ना मिलो
वैसे ही जीता हूँ जिंदगी भी
कल हो ना हो . . .
जो भी है बस यही इक पल है - - - - नीलम - - -

बीते लम्हे

हम - तुम
कितने भी यत्न - प्रयत्न कर ले
बीते लम्हे कभी नहीं लौटते
लौट आते हैं
सावन - भादों
भिगो भी जाती हैं
रिम झिम फुहारें
मगर तुम जाने क्यों नहीं आते
अपनी यादों के साथ
मैं बाट जोहती रह जाती हूँ
भीगे तन - ओ - मन के साथ
काश ! !
हमने समझा होता
हालातों को
जी लिये होते
वो हसीन लम्हे
वक्त रहते जान लिया होता
ये पल ये लम्हे ,
ये सावन और भादों
फ़िर कभी -
ऐसे पल लौटाने नहीं आयेंगे
जब आयेंगे
तब अपने साथ
एक टीस
एक तड़प
दे जायेंगे
मगर तुम तो जी रहे हो ना
तुम्हारा अपनापन और वक्त के बीते लम्हे
और मैं . . .
हाँ मैं भी जी रही हूँ
अपने और तुम्हारे हिस्से का खोखलापन
इस उम्मीद में
तुम फ़िर आयोगे
और खेलोगे मेरी
उलझी लटों के साथ
और अपनी उँगलियों से
सुलझा दोगे सारे
शक - ओ - शुबहा - - - - नीलम - - -

Thursday, September 17, 2015

हिफाजत . . .

उसकी हिफाजत का सलीका भी गजब निकला . . .
कैद में भी रखता है मुझे पर कतर - कतर के - - - - नीलम - - - -

Sunday, September 13, 2015

क्यों अजीब लगता है तुम्हे . .

क्यों अजीब लगता है तुम्हे . . .
तुम्हारा मेरा साथ
हाँ ! ! 
जानती हूँ 
कोई रिश्ता नहीं है 
हमारे दरमिया 
कोई बंधन भी नहीं है 
मगर फ़िर भी 
कुछ तो है ना
वो जो दर - ओ - दीवार पर टंगा है 
यादों जैसा 
वही जो खिड़कियों के परदे पर लहलहाता हुआ 
कुछ बेपरवाह सा तुम्हारा अल्हड़पन 
मैं तो बस अब तुम्हे ही जीती हूँ 
अपने में ,
अपना सा 
किसी सवाल जवाब से परे 
किसी रिश्ते 
किसी बंधन से परे 
बँध जो चुकी हूँ 
तुम्हारी यादों की परछाई के साथ 
और जी लेती हूँ
तुम्हारा मुझ में होने का अहसास  - - - - - नीलम - - - -

Thursday, September 10, 2015

उम्र भले ही पचास पार कर गई हो मगर मैं आज भी जीता हूँ तुम्हे वही अल्हड़ जवानी के जवां शक्स सा उम्र में वैसे भी रखा क्या है कौन जाने कब निकल जायेंगे प्राण बिना किसी से कुछ कहे बिना सुने मौका भी कहाँ देती है जिंदगी बार बार जिंदगी जीने का बस . . . . इसिलए तो मैं जीता हूँ हर पल हर लम्हे को तुम सा जैसे तुम फ़िर मिलो ना मिलो वैसे ही जीता हूँ जिंदगी भी कल हो ना हो जो भी है बस यही इक पल है - - - - नीलम - - -

Ahsaas http://neelamkahsaas.blogspot.com/

याद है मुझे . . . तुमने कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं उस रोज़ जब मैं मिली थी तुमसे आखिरी बार रात अक्सर बेचैनी में ही गुजरती है मेरी बार बार याद आते हैं तुम्हारे शब्द और हमारी अधूरी ख्वाहिशें . . अक्सर कोरे पन्नों को उलट पलट पढ़ने की कोशिश करती हूँ ताकि गढ़ पाऊँ तुम्हारी अधूरी कविता में खुद को देखो ! ! ! अब मैं भी टहलती हूँ छत पर अनगिनत तारों के बीच तन्हा चाँद की तरह मगर मेरी अधूरी ख्वाहिशें और . . मेरे दिल की धड़कने अहसास दिला ही देती हैं के मैं हूँ तो तुम भी तो अभी कहीँ बाकी हो मुझमें - - - - - नीलम - - - -

Ahsaas http://neelamkahsaas.blogspot.com/

Saturday, June 13, 2015

तुम्हारी कविता . . .

हाँ ! ! !
पढ़ी तुम्हारी कविता
मगर . . . .
तुम कब लिख पाये मुझे समेट कर ,
तुम्हारे मुट्ठी भर अक्षर
और चुटकी भर सम्वेदना छितरा देने भर से ही तो कविता नहीँ हो जाती ना ,
कविता कहने के लिये कुछ बीते लम्हे जीने पड़ते है
और. . . .
 कुछ बिखरी सदियां मर मर कर समेटनी पड़ती हैं
तुम्हारे ये मुट्ठी भर अक्षर ,
चुटकी भर सम्वेदना
सब बिखरे ही तो पड़े रहते हैं
तुम्हारी कविताओं में ,
और फ़िर कतरा - कतरा
 उन्हे अपनी कविताओं में समेटते हुए ना जाने कितनी बार टूट कर बिखरती हूँ मैं ,
कभी तो लिखो मुझे
अपनी कविताओं में 
पूरा का पूरा 
- -  - नीलम - - -