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Tuesday, May 25, 2010

क्यूंकि सुखा पत्ता हूँ...

तन्हा तन्हा फिरता हूँ ,
क्यूंकि सुखा पत्ता हूँ,

घर तो लगता अपना ही है,
पर दीवारों से डरता हूँ,


जी रहे हैं सभी यहाँ,
में तो पल पल मरता हूँ,

तुम ठहरे रिश्तों के शहंशाह,
में तो अहसास का पुतला हूँ,

वो बिका तो किसी एक का हो गया ,
में तो बिकने के बाद भी बिकता हूँ,

इक बार जो आया तूफ़ान गुलशन में,
अब तक दर दर भटका हूँ,

नहीं आयूंगा लौट कर कभी बहार में,
फिर भी फुहार की हसरत रखता हूँ,

क्यूंकि सुखा पत्ता हूँ.

21 comments:

  1. Behad khoobsoorti se aapne ek sookhe patte ke dard ko shabdon mein piroya hai.....
    Eeshwar na kare ke kabhi patjhad aaye.....
    Shubhkamnaen!

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  2. kavita ke badshah ho aap!!

    sukha patta...:)
    main to sukha patta hoon..........vasant aate hi har taraf udd kar pahuch jata hoon!!

    pahle tha sabke saath........
    ab tanha tanha idhar se udhar udta hoon!!

    hai na.........neelima jee!!

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  3. जी रहे हैं सभी यहाँ,
    में तो पल पल मरता हूँ,
    तुम ठहरे रिश्तों के शहंशाह,
    में तो अहसास का पुतला

    अत्यंत मार्मिक एवं संवेदनशील रचना

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  4. सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

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  5. मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है
    क्या गरीब अब अपनी बेटी की शादी कर पायेगा ....!
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com/2010/05/blog-post_6458.html
    आप अपनी अनमोल प्रतिक्रियाओं से  प्रोत्‍साहित कर हौसला बढाईयेगा
    सादर ।

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  6. इक बार जो आया तूफ़ान गुलशन में,
    अब तक दर दर भटका हूँ,
    नहीं आयूंगा लौट कर कभी बहार में,
    फिर भी फुहार की हसरत रखता हूँ,
    क्यूंकि सुखा पत्ता हूँ.
    ...Nirasha mein aasha ke bhav bahut gahre utarte hai..
    Bhavpurn prastuti ke liye shubhkammnayne

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  7. Mukesh jee..sahi kahte hain aap.

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  8. Rakesh jee..meri kavita ke bhaavon ko samjhne ka bahut bahut shukriya.:)

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  9. Sanjay jee..tahe dil se shukriya.

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  10. Kavita jee aapki shubhkaamnaayon keliye abhaari hoon. shukriya.

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  11. waah kya matla kaha hai
    bhatka bhatka phirta hun

    kamaal

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  12. Neelam Ji,
    Namaste, Bahut Khoob.....
    वो बिका तो किसी एक का हो गया ,
    में तो बिकने के बाद भी बिकता हूँ,
    Surinder Ratti

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  13. bahot khuub sher hai, aur bayaan bhi kamaal hai

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  14. बाला का जोर हवाओं ने डाल रक्खा है
    मगर चिराग ने लौ को सम्हाल रक्खा है
    इश्वर करे ये एहसास हर सूखे पत्ते में सलामत रहे...उसका अकेलापन महसूस हो रहा है नीलू..शायद हर संवेदनशील इंसान आज के दौर में सूखे पत्ते की तरह तनहा ही है ..भाव और अभिव्यक्ति की धनि हैं आप हमेशा से..लिखते रहिये और हम जैसों को पढने का मौका देती रहिये

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  15. Surrinder jee..bahut shukriya.:)

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  16. Mridula jee..bahut bahut dhanyvaad.

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  17. Anju ..bahut bahut shukriya mera blog join kaarne ke liye bhi aur khoobsurat comment karne ke liye bhi.:)

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