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Friday, June 30, 2017

खुद को ...

मैं उतना ही गढ़ पाती हूँ खुद को
जितना तुम पढ़ पाते हो मुझको

*नीलम*

रंगरेज़....

मैं कागज़ बेरंग
तू रंगरेज़ मेरे अल्फ़ाज़ों का

*नीलम*

रेड एंड वाइट...

धूमकेतु सी बन मैं
जब बहने लगती हूँ
तुम्हारी कविताओं में 
तब
तुम भी ध्रुव तारे सा बन विचरने लगते हो
मेरे साथ
मेरी कवितायों में 
ऐसे
जैसे मुझे तुम पाते हो अपने
रेड एंड वाइट के धुयें से बने
गोल गोल छ्लों में

- नीलम -

तुम्हारे लफ्ज़ ...

तुम्हारे सारे लफ्ज पुरुष ही तो हैं जो शोर करते हैं भीड में
और मेरे लफ्ज स्त्री जो खामोशी में भी सुनते है पसरा हुआ सन्नाटा .

...नीलम..

ख़ामोशी

तुमने रख दी खामोशी पन्नों पर
देखो ! मैने उठा ली सरसराहट सारी .

- - नीलम - -

छुप जाने का हुनर ..

खूब आता है तुम्हे मुझे देख के छुप जाने का हुनर
हवा के झोंके सा मगर छू के फ़िर गुजरते क्यों हो

- - नीलम- - -

उफ़्फ़

हाय ये लरजते लबों की खामोशी
उफ़्फ़ ये आँखों से छलकती दास्तां  .

-- नीलम - -

क्यूँ सोचता हूँ तुम्हें...

तुम अक्सर सवाल करती हो
क्यूँ सोचता हूँ मैं तुम्हे
जरा पास आओ
बताना है आज
क्यूँ सोचता हूँ तुम्हे
तुम्हारी खनक भरी हंसी गूंजती है हर वक़्त मेरे कानो में
इसलिए सोचता हूँ तुम्हे
तुम्हारा अक्स मेरे दर-ओ - दीवार पर उभर आता है
इसलिए सोचता हूँ तुम्हे
रात की चाँदनी में चाँद बनकर जब मेरे ख्यालों की छत पर टहलती हो ना
तब सोचता हूँ तुम्हे
घने काले बादल जब घिर आते हैं
और जब बूंदों के साथ तुम भी मुझे भिगो जाती हो
तब सोचता हूँ तुम्हे
जब सुबह की पहली किरण मेरे सिरहाने तक आती है
और तुम छू लेती हो गुनगुने अहसास की तरह
तब सोचता हूँ तुम्हे
कहाँ खो गयीं तुम
उफ़्फ़!!! 
तुम फिर से सोचने लगी हो ना मुझे ...
[नीलम].

Friday, November 18, 2016

पुरनम रौशनी

पुरनम रौशनी रही तेरे ख्यालों की शब भर
सुबह तक हमने खुद को तेरी यादों के अँधेरे से निकलने ना दिया.
*नीलम *

खामोश लब

तेरे खामोश लबों की बातें
आँखों से समझ लेता हूँ
बडी अजीब बात है
धड़कने मगर मेरे दिल की
दिल उसका धड़काती
नहीं हैं
*नीलम *

दरवाजे

खुले रख दिये हैं सभी दरवाजे इंतजार के
तन्हाई में कभी तो मिल करें बातें प्यार  से
_नीलम _

Saturday, October 8, 2016

ख्यालों में खोना

ख्यालों मै खोना

कुछ खवाब बंज़र जमीन पर बोना

कैसा होता है न

ऐसा, जैसे खुद ही मै खो जाना

ख्यालों मै ही सही

पर तेरा हो जाना

रह ताकना उन राहों की

जहाँ कोई लौट कर नहीं आता

उसी रह पर

कैसा लगता है

मील का पत्थर हो जाना

तेरा जाना फिर भी

उम्मीद दे जाता है

तेरा, मेरा हो जाना.

****नीलम***

Wednesday, October 5, 2016

घडियां इंतज़ार की

जानती हूँ
तुम आज भी कर रहे हो
इंतज़ार
और जी रहे हो
उम्मीद
और उम्मीदें इन्तजार को आसान बना देती हैं
और मैं ...
मैं जी रही हूँ
घडियां इंतज़ार की
तुम्हे खेल लगता है ना मेरा यूँ अचानक चले जाना
मगर
कहाँ जा पाई मैं तुम्हे छोड़ कर
मेरा जिस्म ही तो गया तुमसे दूर
मेरी रूह तो वहीं रह गई
तुम्हारे पास
जिसे तुम देखते ही नहीं
शायद तुम्हे मैं ज़िस्म के
साथ ही चाहिये थी
इसिलिये मेरी तुम में भटकती रूह छोड
तुम तलाश रहे हो
मेरा तुम बिन
बेजान जिस्म
नीलम

मैं लेखिका नहीं

मैं लेखिका नहीँ हूँ
मगर फ़िर भी लिखती हूँ कविता
कुछ यादें
कुछ सपने
और कुछ अहसास
जो हैं मेरे लिये बहुत खास
मेरे लिये मेरी कवितायें हैं
ओस की बूँदों के समान
खिड़की पर बैठ मेरा इंतजार करता हुआ चाँद है मेरी कविता
सूखे पत्ते ,नम सम्वेदनाएँ
और
मील के पत्थर है मेरी कविता
थोड़ी तन्हाई - थोड़ी रुस्वाई
थोड़ी मोहब्बत
और थोड़ा सा इनकार है मेरी कविता
मैं लेखिका तॊ नहीँ हूँ
मगर
फ़िर भी लिखती हूँ कविता - - - नीलम - - - -

आदत

तुम्हारी कहानी
के पहले शब्द से आखिरी शब्द तक
होती है सिर्फ तुम्हारी कविता
जो करती है तुम्हारी ही बात
और फ़िर पूर्णविराम के बाद भी कोसों दूर तक
दिखता हूँ तुम्हे सिर्फ मैं
और मुझे दिखती हो तुम
मेरी ज़िंदगी के सुबह से शाम और शाम से रात तक
और महसूस करता हूँ
सिर्फ तुम्हे और तुम्हारी ज़रूरत
मेरी धड़कनों को धड़कने के लिये
आदत खुद को लिखने को नहीं
आदत तुम्हे जीने को कहते हैं
समझीं तुम !!!

*नीलम*

सदी

हाँ याद है मुझे
उस मोड से इस मोड तक
की वो सदी
जिसे तुम साथ ले गई
और जी रही हो
और मैं ...
मैं आज भी इस मोड से उस मोड तक
खडी सदी को महसूस करता हूँ
और ख्यालों में
जी लेता हूँ तुम्हारे साथ
वही खडी हुई सदी

नीलम🙏�🙏

Tuesday, October 4, 2016

आदतन

आदतन
मैं कुछ ना कुछ कहूँगा जरुर
और
आदतन तुम सुनोगी नहीं
क्योंकि
मुझे ताकती तुम्हारी आंखें
बेमायना कर देती हैं
मेरे सारे लफज़ों को
और फ़िर मैं शब्द होते हुए भी
हो जाता हूँ निशब्द
ये हुनर बस तुम ही जानती हो
*नीलम*

Sunday, October 2, 2016

कोरे पन्नें

सही कहती हो
तुम लिखना कहाँ जानती हो
तुम तो सिर्फ मुझे पढ. गढ रही हो
तुम पी रही हो अपने हिस्से का समन्दर
और मैं
झरने सा कल कल करता जल बन समा रहा तुझमे
तुम पी रही हो उतारा हुआ अँधेरा
और मैं
मैं जी रहा हूँ तुम्हारा दिया हुआ सवेरा
सच कहती हो
तुम कब मिलती हो मुझे कागज़ की आडी टेडी रेखाओं में .
तुम तो मुझे मिलती हो
मेरी कविताओं में
हाँ ...
अब मैने भी कोरे पन्नों को छू कर
तुम्हे जान लिया है
इसिलिये तो
बिन छुए
तुम्हे अपना मान लिया है

...नीलम...

कहानियाँ

ओह !!!
तो क्या मैं सिर्फ तुम्हारी कहानी का हिस्सा भर हूँ
मुझे तो लगा था
मैं ही तुम्हारी कहानी का हीरो हूँ
मगर मैं तुम्हारे लिये मुडे हुए पन्ने के सिवा कुछ भी नहीं
हाँ
पीला तो पडने लगा हूँ  अब
क्योंकि
तुम्हारी नज़र में मैं सिर्फ एक किरदार हूँ
और अब तुम मुझे इत्तेफाक भी तो नहीं मानती हो ना
मगर हमारा मिलना तो इत्तेफाक ही था
इत्तेफाक उग जाया करते हैं
अक्सर तन्हाइयों के जंगल में
और जब तन्हाई को हकीकत की जमीं मिलती है ना
तब हकीकत सिर्फ साजिशें ही रचती है
और
कहानियाँ ...
कहानियाँ एक ना एक दिन तो खत्म
होती ही हैं

नीलम 🙏

लफ्ज

तुम्हारे सारे लफ्ज पुरुष ही तो हैं जो शोर करते हैं भीड में
और मेरे लफ्ज स्त्री .जो खामोशी में भी सुनते है पसरा हुआ सन्नाटा
...नीलम..🙏

Monday, July 18, 2016

ज़ुस्तज़ू

ख्याल भी हसरतें भी और ज़ुस्तज़ू भी हो .क्या खूब हो के उस पर तेरी जरुरत भी ना हो ....नीलम....